RKrishnan Sharma
😀😀होशियार बच्चा और रामायण की कहानी, अवश्य पढ़ें। 😀😀
अध्यापक :-बच्चों रामचंद्र जी ने समुद्र पर पुल बनाने का निर्णय लिया
पप्पू :- सर मैं कुछ कहना चाहता हूँ।
अध्यापक :- कहो बेटा
पप्पू :- रामचंद्र जी का पुल बनाने का निर्णय गलत था।
अध्यापक :- वो कैसे।
पप्पू :- सर, उनके पास हनुमान थे
जो उडकर लंका जा सकते थे।
तो उनको पुल बनाने की कोई जरूरत नहीं थी
अध्यापक :- हनुमान ही तो उड़ना जानते थे बाकी रीछ और वानर तो नहीं उडते थे।
पप्पू :- सर वो हनुमान की पीठ पर बैठ कर जा सकते थे।
जब हनुमान पुरा पहाड़ उठाकर ले जा सकते थे।
तो.....
अध्यापक :- भगवान की लीला पर सवाल नहीं उठाया करते नालायक
पप्पू :- वैसे सर एक उपाय और था।
अध्यापक :- (गुस्से में ).....क्या ?
पप्पू :- सर, हनुमान अपने आकार को कितना भी छोटा बड़ा कर सकते थे
जैसे सुरसा के मुंह से निकलने के लिए छोटे हो गये थे और सूर्य को मुंह में लेते समय सूर्य से भी बडे..........
तो वो अपने आकार को भी तो समुद्र की चौडाई से बड़ा कर सकते थे और समुद्र के ऊपर लेट जाते।
और सारे बन्दर 🙊 हनुमान जी की पीठ से गुजरकर लंका पहुंच जाते और रामचंद्र को भी समुद्र की अनुनय विनय करने की जरूरत नहीं पड़ती।
वैसे सर एक बात और पूछूँ?
अध्यापक :- पूछो।
पप्पू :- सर सुना है।
समुन्द्र पर पुल बनाते समय वानरों ने पत्थर पर "राम" नाम लिखा था.....
जिससे वो पत्थर पानी 💧 में तैरने लगे।
अध्यापक :- हाँ तो ये सही है।
पप्पू :- सर, सवाल ये है बन्दर भालूओ को पढना लिखना किसने सिखाया था?
और श्री राम लिखे पत्थर तैर जाते थे लेकिन श्री राम जी खुद डूब जाते थे ऐसे क्यों सर?
अध्यापक :- हरामखोर पाखंडी बन्द कर अपनी बकवास और मुर्गा बन जा
पप्पू :-ठीक है सर, सदियों से हम मूर्ख बनते आ रहे हैं.....
चलो आज मुर्गा बन जाते हैं!!!!!
सत्य को जानने की कोशिश करनी चाहिए. सत्य जानने के लिए उलट पुलट हर तरह के विचार पढ़ कर सोचना चाहिए. किसी लोखी गई या कही गई बात को आँख बंद कर नहीं मानना चाहिए. सत्य ही सुन्दर है. सत्य ही कल्याणकरी है.
शनिवार, 5 अगस्त 2017
तर्क
God?
Ajay Kumar _
मान लीजिये कि God होता है
लेकिन समस्या ये है कि दुनिया में हज़ारों किस्म के छोटे-बड़े God हैं, किसको असली God माना जाये ?
कोई भी God अपनी शक्ल नहीं दिखाता, अपना पता-ठिकाना नहीं बताता तो किसको असली माना जाये ?
कुछ लोगों ने God के रिश्तेदार होने का दावा किया है,
ैलेकिन दिक़्क़त ये है कि किस रिश्तेदार पे विश्वास किया जाये, और क्यों विश्वास किया जाये ?
कभी God ने तो कहा नहीं कि वो मेरा रिश्तेदार या ख़ास बंदा है..
कुछ अध्यात्मक इन्सान हुए, जो आज के धार्मिक लोगों की तरह जीवनभर किसी God का गुणगान करते रहे, उन्होंने रिश्तेदार होने का दावा नहीं किया,
लेकिन भक्तों ने उनको भी God का रिश्तेदार मान लिया,
या उनको ही God मान लिया.
सदियों पहले कुछ लोगों ने कहानियां लिखी, उन कहानियों के कुछ पात्रों को God मान लिया गया,
सदियों पहले कुछ समझदार इन्सानों ने जीवन उपयोगी चीज़ों और कुदरती शक्तियों के प्रतीक बनाये, करोड़ों लोगों ने उन प्रतीकों को God मान लिया..
पिछली सदियों में अलग-अलग तरीक़े से हज़ारों God बनाये गये.. आज भी हज़ारों किस्म के God बनते हैं.
एक बंदे ने धार्मिक पहनावा पहनकर जादू के चार ट्रिक दिखाये तो करोड़ों लोगों ने उसको God मान लिया,
एक फ़क़ीर मांगकर खाता था,
वो मर गया तो करोड़ों लोगों ने उसको God मान लिया..
लोग तो मानसिक विकलांगों को भी God बना देते हैं, कोई शातिर बनना चाहे तो क्या मुश्किल है ?
इस वक़्त देशभर में जीते-जागते हज़ारों God हैं, जिनको करोड़ों लोग मानते हैं.
रोज़ नये-नये God सामने आते हैं , और आते रहेंगे..
अब हज़ारों किस्म के God हैं, किस God को असली माना जाये ?.. मानने की ज़रूरत भी क्या है ?
किसी झूठ में आस्था रखने वाले को अगर आस्तिक कहते हैं, तो मुझे गर्व है कि मैं सच में आस्था रखने वाला नास्तिक हूँ..
हर आस्तिक को ये पता होना चाहिये, ,कि दूसरे धर्मों के लोग उसको भी नास्तिक मानते हैं..
हर आस्तिक पांच-छह सौ करोड़ लोगों की नज़र में नास्तिक होता है...
भगवान के शरण में सारे पापों से मुक्ति
Hirday Nath
अनैतिकता और भ्रष्टाचार के लिए अध्यात्मिक लाईसेंस !
हमारे देश में धार्मिक पाखंड एवं धार्मिक क्रियाकलापों का पालन करनेवाला, घोर दुराचारी परम आदरणीय धर्मात्मा कहलाता है जबकि अनेक देशों में चरित्र की पवित्रता से ही व्यक्ति को सम्मान योग्य धर्मात्मा या श्रेष्ठ माना जाता है. कमाल देखिए हमारे हां तथाकथित भगवान के स्वयंभू "अधिकृत " ठेकेदार डंके की चोट पर ऐलान करते हैं कि एक जन्म में क्या, लाखों जन्मों में किया हुआ पाप भी केवल "भगवान " का नाम लेने/शरण में जाने से माफ हो जाता है अथवा किसी तीर्थ स्थल में जाकर स्नानादि से धुल जाता है. बिना किसी शर्त के खुला लाईसेंस है. ऐसी हालत में कोई धर्म अनुयायी भला काहे को पाप से दूर रहेगा.
अध्यात्मिक लाईसेंस के कुछ संदर्भ यहाँ प्रस्तुत कर रहा हूँ
# अन्य क्षेत्रे कृतं पापं काशिक्षेत्रे विनाश्यति (काशीमाहात्मय).अर्थात कहीं भी किया गया पाप काशी(प्रयाग) यात्रा से नष्ट हो जाता है.
# गंगा गंगेति यो ब्रूयाद्योजनानां शतैरपि,
मुच्यते सर्वपापेभ्यो विष्णुलोकं स गच्छति. (ब्रह्मपुराण अध्याय 175,पद्य्मपुराण अध्याय 13).
अर्थात जो भक्त सेंकड़ों सहस्त्रों कोश (मील/किलोमीटर)से भी गंगा गंगा बोलता रहे, वह सभी पापों से मुक्त होकर मरनोपरान्त विष्णुलोक /वैकुंठ को जाता है.
# प्रातः काले शिवं दृष्टवा निशिपापं विनश्यति,
आजन्मकृतं मध्याह्ने सायाह्ने सप्तजन्मानाम्. (तीर्थदर्पण, परिच्छेद 2).जो भक्त प्रातःकाल में शिव अर्थात लिंग या उसकी मूर्ति का दर्शन करता है, तो रात्रि, दोपहर,संध्या और सात जन्मों के पाप से वह मुक्त हे जाता है.
# अपि चेत्सुदुराचारो भजते मामनन्यभाक्
साधरेव स मन्तव्यः सभ्यग्व्यसितो हि सः (गीता 9/30).
अर्थात यदि कोई जघन्य से जघन्य अपराध करता है किन्तु वह मेरी भक्ति में लीन रहता है तो उसे साधु/महात्मा मानना चाहिए क्योंकि वह अपने संकल्प में अडिग रहता है.
# क्षिप्रं भवति धर्मात्मा शश्वच्छान्तिं निगच्छति
कौन्तीय प्रतिजानिह न स मे भक्तः प्रणश्यति. (गीता 9/31).अर्थात वह जघन्य अपराधी तुरन्त धर्मात्मा बन जाता है और स्थायी शान्ति को प्राप्त होता है. हे कुन्तीपुत्र, निडर होकर घोषणा कर दो कि मेरे भक्त का कभी विनाश नहीं होता है.
# सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज
अहं त्वां सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः (गीता, 18/66).अर्थात सम्सत प्रकार के धर्मों का परित्याग करो, और मेरी शरण में आओ, डरो मत, मैं सभी पापों से तुम्हें मुक्त कर दूंगा.🤔🤔🤔
नामकरण
दलितों को भी कोई महान नाम देकर सम्मान देना चाहिए ।
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Panchanan Mishra_
दिव्यांग की ही तरह दलित का भी नया नामकरन क्यों न किया जावे ?
ईश्वर? इंसानियत
Chandra Prakash Barmate
मेरे लिए प्रकृति ही ईश्वर है
विज्ञान ही सत्य है
इंसानियत ही धर्म है
और कर्म ही पूजा हैं ।
वैज्ञानिक दृष्टिकोण
Ajaib Jalalana
वर्तमान भारतीय समाज के कायाकल्प की आवश्यकता है, क्योंकि इस देश में जिसे वैज्ञानिक प्रशिक्षण मिला है, उनमें भी दूर-दूर तक वैज्ञानिक दृष्टिकोण नज़र नहीं आता और यह स्थिति बेहद निराशाजनक है।
हमारे वैज्ञानिक जैसे ही घर पहुँचकर जूते उतारकर कपड़े बदलते हैं कि उसके साथ ही उनके मन-मष्तिष्क से तर्कशीलता और प्रयोगशीलता भी उतर जाती है और वे हर तरह की रूढ़ियों, रिवाजों और भ्रमजाल से बुनी आरामकुर्सी पर पसर जाते हैं। डॉक्टरों को इसमें कोई बुराई नज़र नहीं आती कि उनके मरीज तिरुपति के बालाजी के मंदिर या स्थानीय मंदिर में अपने रोग मुक्ति के लिए पूजा-अर्चना करें, बल्कि वे स्वयं भी इस तरह के कर्मकांड से कोई परहेज नहीं करते। जब भी कोई नया वैज्ञानिक संस्थान बनता है या कोई बड़ा प्रयोग या अभियान शुरू किया जाता है तो हमारे बड़े-बड़े वैज्ञानिक भी नारियल फोड़कर मंदिरों में चढ़ावा चढ़ाना और देवता का आशीर्वाद लेना नहीं भूलते, जैसे कि उनका प्रयास विज्ञान से नहीं, दैवी कृपा से ही सफल होगा। लेकिन मौका मिलने पर वैज्ञानिकों के बीच वे भी वैज्ञानिक दृष्टिकोण की हिमायत करेंगे।
जो अन्धविश्वास में फंसे हैं उनके लिए हमारे देश के दैनिक समाचार-पत्र और साप्ताहिक-मासिक पत्रिकाएँ तमाम तरह की आकर्षक मगर तर्कहीन सामग्री छापने से नहीं चुकती। हर बड़े अख़बार में 'अपना भविष्यफल जानिए' जैसे स्तम्भों के लिए जरूर जगह रखी जाती है, जिसमें अगले सप्ताह के राशिफल दिए जाते हैं। इस सप्ताह लक्ष्मी की कृपा, स्वास्थ्य संबंधी, प्रेम, विवाह योग इत्यादि। यात्रा के लिए कुछ दिन शुभ-अशुभ माने जाते हैं। कुछ दिनों, संख्याओं और रंगों को विशेष रूप से भाग्यशाली माना जाता है।
वैज्ञानिकों का भी रूढ़िवादिता की ऐसी कीचड़ में लोट-पोट होना और इसके बावजूद लोगों में अन्धविश्वास और दैवी सत्ता पर ऊँगली उठाते हुए वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाया जाएगा, इसकी आशा करना? क्या इसकी कोशिश करना भी सम्भव है या उपयोगी है?
भीख नहीं सहयोग
अपंग बूढ़े के अतिरिक्त अन्य भिखारियों को भीख देकर निठल्लापन को बढ़ावा देना है। इससे अच्छा है जरूरतमंद विद्यार्थियों को सहयोग करें।
गरीबों के दुश्मन
Dinesh Aastik
रुढ़ियों को लोग इसलिए मानते हैं, क्योंकि उनके सामने रुढ़ियों को तोड़ने के उदहारण पर्याप्त मात्र में नहीं हैं। लोगों को इस ख़्याल का जोर से प्रचार करना चाहिए की मज़हब और खुदा गरीबों के सबसे बड़े दुश्मन हैं।
– राहुल सांकृत्यायन
(9 अप्रैल 1893 – 14 अप्रैल 1963)
शुक्रवार, 4 अगस्त 2017
मनुष्यता के पर्याय श्री पूर्ण चंद्र गुप्ता _ डाॅ मीनकेतन प्रधान
मनुष्यता के पर्याय श्री पूर्णचन्द्र्र्र गुप्ता
किसी व्यक्ति पर सायास कुछ लिखना कितना कठिन होता है, यह अभी महसूस कर रहा हूँ, खासकर ऐसे व्यक्ति पर जो बचपन से अब तक लगातार दिलोदिमाग में छाया रहे और अचानक संसार से उठ जाय, अभी उड़ीसा प्रवास से रायगढ़ लौटने पर पता चला - ‘‘दादा’’ पूर्णचन्द्र्र्र गुप्ता नही रहे... मंै धक् से रह गया, सोचता रहा.... नजरों के सामने उभर आता ....... खुला बदन, कमर के ऊपर नाभी से पैर तक पसरी सफेद धोती और दाहिने कंधे को कसता हुआ आखरी छोर-हल्का नील लगा हुआ.... जैसे भीतर का निर्विकार भाव था वैसा ही परिधान। तिलकता उन्नत माथा - दो तीन लकीरों का गंगा-जमुनी अन्तर्प्रवाह ...... जाने कहां से दौड़ रही होती सरस्वती की गुप्त धारा - धारीदार पुष्ट होठों में छलकती कभी न सूखने वाली स्वर-लहरियां, खींच लेने वाली ठसक भरी मोहक मुस्कान..... ओजस्वी वाणी...... जैसे कह रहे हों और प्रोफेसर साहब ...... मै संकुचित हो उठता........फूर्ति से आगे बढ़ प्रणाम् निवेदन करता तो.... कभी वे हथेली पकड़ हाथ मिलाते या कंधांे पर अपने स्नेहिल हाथों को रख इतने प्यार से हाल-चाल पूछते कि एहसास नहीं होता मेरी कुल उम्र 55 बरस से भी पहले स्वाधीनता आंदोलनों के सिपाही और महानतम् सामाजिक - मानवीय जीवन मूल्यों के पुरस्कर्ताओं में अग्रगण्य रहे हैं। नई पीढ़ी को इतनी ऊंचाई में प्रतिष्ठित कर उसके भीतर की समस्त सम्भावनाओं को दुलारने- उभारने की ऐसी उदार भावना आज के आत्मकेन्द्रित वैष्विक बाजार में भला कहाँ देखने को मिलती है।
दो-तीन बरसों से मैं उनसे मिलना चाह रहा था, नहीं मिल सका........... इसका अफसोस जीवन भर सालता रहेगा। आज उनके बारे मे जो कुछ सोचा जा रहा है, क्या बहुत पहले नहीं सोचा-लिखा जा सकता था? जीवन - संघर्ष के घने अंधेरे को चीर-फाड़कर पूनम की दूध धूली चांदनी रातों मंे जीवन चक्र पूर्ण कर वह शारदेय शीतल-चन्द्र अनंत आकाष की प्रभाती रष्मिवलयों मंे अब गुप्त एहसास दिलाता रहेगा अपने होने का.... ऐसे थे पूर्णचन्द्र्र्र गुप्ता जी।
बहरहाल ... बहुत पहले की एक साध थी - बहुआयामी व्यक्तित्व से महिमामण्डित श्रध्देय श्री पूर्णचन्द्र गुप्ता के सामाजिक, राजनैतिक, संास्कृतिक प्रदेय को राष्ट्रीय-पृष्ठभूमि पर रेखंाकित होना चाहिए। उनके जीवन-काल में यह संभव न हो सका। होता भी कैसे- वे आत्मष्लाघा, भांैडा प्रदर्षन से कोसों दूर, कर्म के पथ पर संघर्षरत जननायक थे। प्रचार-प्रसार और छपास की भूख उन्हेें कभी छू न सकी। इसलिये यह बात सुकून दिलाती है कि उनके ज्येष्ठपुत्र डाॅ. सर्वेष षरण गुप्ता द्वारा यषस्वी काया के अस्थि-विसर्जन हेतु इलाहाबाद त्रिवेणी संगम प्रस्थित होने के बाद पैतृक गाँव लोई्रग के कर्मठ जनसेवी श्री सरोज गुप्ता द्वारा लिखित ‘‘रायगढ़ पूर्वांचल के पुरोधा श्री पूर्णचन्द्र गुप्ता’’, स्मरणिका का प्रकाषन हो रहा है। स्वनाम धन्य बहुआयामी व्यक्तित्व सम्पन्न पूर्णचन्द्र्र्र गुप्ता जी के प्रेरक प्रसंगों को उजागर करने के उद्देष्य से ब्रिटिषकालीन राजनैतिक-सामाजिक व्यवस्था की क्रूरता को झेलते हुए स्वातंत्र्योत्तर भारतीय जीवन-मूल्यों के उन्नयन की दिषा में समर्पित अक्षांषों को उभारा गया है। उनके स्नेहभाजक इस पुस्तक के लेखक श्री सरोज गुप्ता मूलतः ग्राम्य जन- संस्कृति की राजनैतिक - धारा के नैतृत्वकत्र्ता हैं, उनकी मार्मिक भावनाओं का यह अंष उल्लेखनीय है -
‘‘पूर्णचन्द्र्र्र गुप्ता ने महात्मागाँधी के ग्रामोदय की आस्था, नेहरु की उदारता, षास्त्री की सौम्यता, जयप्रकाष की निर्भीकता, लोहिया की कर्मण्यता, विनोबा की साधुता का अपने जीवन में अनुषरण किया ’’। वे लोकतन्त्र के हिमायती थे। गाँव में अपने विचारों को, अपने सिध्दान्तों को लोगों पर नहीं थोपते थे बल्कि लोगों का दिल जीतकर समझाबुझाकर कार्य करने वाले थे।
मनुष्यता के पर्याय कीर्तिषेष श्री पूर्णचन्द्र्र्र गुप्ता छत्तीसगढ़ एवं रायगढ़ जिले के ग्राम्याचंलों मंे ‘‘पुरनो गौंटिया’’ के नाम से सर्वविख्यात थे; किसी पोस्टर-पम्पलेट के मोहताज बिल्कुल नहीं। उनके सर्वथा सुयोग्य कनिष्ठ पुत्र इंजिनियर श्री विक्रम गुप्ता के सद्प्रयासों से यह पुस्तक रुपाकार ग्रहण कर रही है यह मेरे लिये बहुत सुकून की बात है।
डाॅ. मीनकेतन प्रधान
शासकीय किरोड़ीमल कला विज्ञान एवं वाणिज्य महाविद्यालय रायगढ़
सत्यनारायण पूजा
Bhante Budh_ 🎈ब्रामण की पोल खोल ???
गाँव में सत्य नारायण की पूजा बहुत होती थी।
🎈 हमने पूजा की पोल खोलने की ठानी।
मैंने एक मित्र को प्लानिंग के साथ पूजा में बिठाया। पंडितजी ने गोबर के गणेश बनाकर मित्र को कहा कि गणेशजी पर पानी प्राछन्न करो।
🎈 मेरे मित्र ने कहा कि यह तो गाय का गोबर है लेकिन आप गणेश कह रहे हैं। यह गलत है।
⛳ पंडितजी ने कहा मान लो गणेशजी हैं।
🎈मित्र ने कहा कैसे मान ले ?❓
⛳पंडित जी ने कहा अरे भाई मै कहता हूँ मान लो।
🎈 मित्र ने कहा ठीक है। पूजा शुरू हुई । पूजा में पंडितजी ने तमाम उदहारण देकर बताया की जिसने सत्य नारायण की पूजा की उसे लाभ हुआ जिसने नहीं सुनी उसे नुकसान हुआ।
🎈 मेरे मित्र ने कहा पंडित जी आपने बताया जिसने सुनी उसे फायदा हुआ, जिसने नहीं सुनी उसे नुकसान हुआ लेकिन वह कथा/मन्त्र क्या है।
⛳पंडितजी निरुत्तर।
खैर कथा समाप्त होने के बाद मेरे
🎈मित्र ने उसी गोबर गणेश को उठाया और उसे गोल-गोल करके पेड़ा (मिठाई) का आकार देकर ,,,,,, पंडित जी से कहा यह लो पंडितजी प्रसाद के रूप में पेड़ा खाओ।
⛳पंडितजी ने कहा यह तो गोबर है इसे कैसे खाऊ।
🎈 मित्र ने कहा मान लो पेड़ा है।
⛳पंडितजी ने कहा ऐसे कैसे मान लूँ।
🎈 मित्र ने कहा मै कह रहा हूँ मान लो।
⛳पंडितजी ने कहा क्यों ?
🎈मित्र ने कहा आपने मुझे गोबर को गणेश मानने के लिए कहा, मैंने मान लिया, फिर आप क्यों नहीं मानोंगे।
⛳ पंडितजी की सिट्टी पिट्टी गुम। थैला लेकर भागने लगे।
हम लोगों ने उनकी साईकिल पकड़ी और कहा ठीक है यह नहीं खाओगे तो जो प्रसाद (गुड चना की दाल) बना है उसे तो खा लो।
⛳पंडितजी ने थैली देकर कहा कि इसमें दे दो। हम लोगों ने कहा कि प्रसाद मेरे साथ आप भी खाओ। उन्होंने नही खाया और पूछने पर कहा कि मै "आपके घर का प्रसाद " नही खा सकता।
🎈हमने पूछा क्यों ? वही उत्तर आप नीच जाति के हो। फिर मैंने पूंछा अभी आपने कथा में कहा था कि जिसने प्रसाद का तिरस्कार किया उसका सर्वनाश हो गया था, लेकिन आप ही प्रसाद का तिरस्कार कर रहे हैं।
हम लोगो को यहाँ मुर्ख बनाने आते हो क्या ?❓
⛳ पंडितजी साईकिल छोडकर भागने लगे। हमने पूंछा अच्छा यह तो बताते जाओ की जो हर बार बचा हुआ प्रसाद ले जाते थे उसका क्या करते थे ?❓
⛳पंडितजी यह कहते हुए भाग गए कि वह प्रसाद मेरे जानवर खाते हैं।
साथियों मेरा अनुरोध है किसी बात को मानने से पहले जानो। जो प्रसाद आप खाते हो , वाही प्रसाद उनके जानवर खाते हैं अर्थात आपकी गिनती उनकी निगाह में जानवरों के समान है। मानसिक गुलामी की बेड़ियाँ तोड़ दो। उनकी निगाह में जानवरों के समान है।
सोंचों और सत्य नारायण कथा सुनना बंद करो।
मानसिक गुलामी की बेड़ियाँ तोड़ द
गुरुवार, 3 अगस्त 2017
छद्म विज्ञान
Sharad Kokas
छद्मविज्ञान किसे कहते हैं :- छद्मविज्ञान या pseudoscience यह संप्रत्यय उस क्रियाकलाप या विधि के लिए प्रयुक्त होता है जो विधि वैज्ञानिक होने का आभास उत्पन्न करती है किन्तु सम्यक वैज्ञानिक विधि का अनुसरण नहीं करती । सम्यक वैज्ञानिक विधि वह होती है जो कार्य कारण सम्बन्ध पर आधारित होती है एवं जिसके लिए निरंतर प्रयोग किये जाते हैं । छद्मविज्ञानी जैसा शब्द उन लोगों के लिए इस्तेमाल किया जाता है जो बिना किसी आधार के किसी भी बात को वैज्ञानिक कह देते हैं । जैसे आजकल सोशल मीडिया पर आपने देखा होगा , डायबिटीज़ की बहुत सारी दवाएं बताई जा रही हैं ,एक विधि में तो गेंहू को दस मिनट उबालकर अंकुर निकालने के लिए कहा गया है । कोई भी यह जान सकता है कि उबलने के बाद अंकुर नहीं निकलते । इस तरह की सोच वाले व्यक्ति को हम यदि मानसिक रूप से विकलांग कहें तो क्या हर्ज़ है ? वैसे मनुष्य के मस्तिष्क की विकलांगता का सिलसिला बहुत पुराना नहीं है लेकिन विज्ञान और छद्मविज्ञान को एक मान लेने के कारण सबसे अधिक नुकसान यह हुआ कि हमने विश्वास और अन्ध विश्वास मे अंतर करना छोड़ दिया ।
बहरहाल ऐसा होने के फलस्वरूप ऐसी अनेक मान्यताओं ने हमारे जीवन में अपना स्थान मज़बूत कर लिया जिनका वास्तविकताओं से कोई सम्बन्ध नहीं है। मानव जीवन के प्रारम्भिक दौर में जब मनुष्य जन्म ,मृत्यु और प्रकृति के रहस्यों से नावाकिफ था ,बीमारियाँ और प्राकृतिक विपदायें उसे घेर लेती थीं और वह असमय ही काल के गाल में समा जाता था । कार्य और कारण का सम्बन्ध स्थापित कर पाने की क्षमता उसमें नहीं थी फलस्वरूप अपने जीवन में जन्म ,मृत्यु से लेकर भूख ,बीमारी और शिकार प्राप्त करने की स्थितियों में वह किसी अज्ञात शक्ति की कल्पना करने लगा । उसने अपने विवेकानुसार जीवन को सुरक्षित रूप से संचालित करने के लिए अनेक मान्यताएँ गढ़ लीं ।
यह प्रारंभिक मानव हर घटना को अत्यंत आश्चर्य भाव से देखता था तथा हर आश्चर्य के पीछे उसे किसी अज्ञात शक्ति का भास होता था । वह जिसका शिकार करता या जिस पेड़ से फल या कंदमूल प्राप्त करता उसे भी अपना आराध्य मानने लगा । उसने यह भी माना कि यह पशु- पक्षी,पेड़ ,पर्वत या नदी उसके पूर्वज हैं और इन्हीं से उसके वंश की उत्पत्ति हुई है । इन्हें ही हम ‘टोटेम’ कहते हैं । जैसे बंगाल के संथाली कबीले के लोग अपना टोटेम जंगली हंस या बतख को मानते हैं और अपने पूर्वजों को हंस के अंडे से उत्पन्न मानते हैं । जिस पेड़ से उन्हें फल मिलते थे या जिस जानवर का वे मांस खाते थे वे भी उनके टोटेम थे । कहीं कहीं पर टोटेम जीवों का मांस खाना या टोटेम पेड़ों के फल खाना सही माना जाता था इसलिए कि वे प्रचुर मात्रा में उपलब्ध थे इसके विपरीत जहाँ इनकी संख्या नगण्य थी वहां इनका सेवन निषिद्ध था । आज भी कई घरों में कुछ चीजें या जीव खाने की मनाही होती है । सांप बिच्छू भी कुछ कबीलों के टोटेम थे इसलिए कि या तो वे उनके लिए संहारक थे अथवा उनकी रक्षा करते थे । यह टोटेम वाद आदिम अर्थव्यवस्था में धर्म का ही एक रूप था ।
शरद कोकास
जय संविधान
Viddya D Verma > आओ तर्क करें
*पूरी रामायण और महाभारत 3-3 बार पढ़ा और यही समझा की।*
*1-जिस देश के महापुरुष ने छोटी सी बात पर स्त्री के नाक काट दिए थे वहां के समाज में तेजाब फेकना कौन सी बड़ी बात है।*
*2-जिस देश के महापुरुष ने केवल इस बात पे एक शुद्र की हत्या कर दी थी की उसने यज्ञ किया था वहाँ शूद्रों को मन्दिर में जाने से रोकना कौन सी बड़ी बात है।*
*3-पाँच पाँच पतियों के होते हुए अगर स्त्री का चिरहरण पुरे सभा के बिच में हो सकता है वहाँ के समाज में बलात्कार और छेड़छाड़ तो मामूली बात होगी*
*4-जहाँ स्त्री को ही हर बार अग्निपरीक्षा देनी पड़ी हो वहां के समाज में पुरुष के सामने स्त्री की कोई औकात नही ये कौन सी बड़ी बात है।*
*5-जहां देवता ही बलात्कार करता हो और दंड भुगतना पड़ता हो स्त्री को उस समाज में स्त्री हमेशा प्रताड़ित हो कौन सी बड़ी बात है (अहिल्याव् गौतम )*
*6-जहाँ गुरु ने सिर्फ इस बात पे शिष्य का अंगूठा काट लिया हो की वह शुद्र है वहाँ इनके पढने से रोका जाये कौन बड़ी बात है*
*एक और बड़ी बात------*
*दोनों ग्रन्थों में कोई भी normal तरीके से नही पैदा हुआ है कोई आम से तो कोई सूर्य से तो कोई मछली से पता नही कहाँ कहाँ से.....और हम विश्वास करते हैं ।*
*देश को आगे बढाना है संविधान पढो*
*संविधान पढ़ने से सबकुछ अपने से ठीक होना चालू हो जायेगा*
*"सारी समस्या का एक समाधान संविधान का सच्चा ज्ञान"*
*जय संविधान*
अफवाह
Sobran Kabir Yadav
चोटी कटवा, मंकी मैन , गणेश की मूर्ति के दूध पीने की अफवाह के माध्यम से एक धर्मांध वर्ग अपने स्वार्थ के लिए ये चेक करता हैं कि जनता में वैज्ञानिक चेतना का कितना विकास हुआ।
और लोगों की मूर्खता के प्रदर्शन से हर बार बेहतर परिणाम मिले।।
वे ये भी चेक करता है कि अफवाह फैलाने की उसकी काबलियत कितनी ठीक है ?
कहते हैं यह सब आर एस एस करता है।
पवित्रता
Amita Ambedkar
"न नग्न रहने से, न सिर मुंडवाने से, न जटाएं रखने से, न भभूत लगाने से, न पूजापाठ से, न कलाई में धागा बाधने से, न नदियो मे स्नान करने से और न ईश्वर या किसी देवी देवता का नाम रटने से और न ही कोई कर्मकांड से कोई मनुष्य पवित्र नहीँ हो जाता......!
जिसमे सत्य है, सदाचार है, शीलवान है, वही मनुष्य पवित्र है.......!
"न जाति से, न वंश से, न जन्म, से कोई मनुष्य अपवित्र नही हो जाता !
जिसमें सत्य नही, सदाचार नहीं शीलवान नहीं, वही मनुष्य अपवित्र है !"
तथागत गौतम बुध्द
बुधवार, 2 अगस्त 2017
मंगलवार, 1 अगस्त 2017
सुनी सुनाई बात
सब सुनी सुनाई, पढ़ी हुई बात पर भरोसा कर लेते हैं । विरोध होते हैं जो सोच विचार कर मानते हैं ।
मैत्री दिवस मनाएं
संजय कुमार
आओ मित्रता दिवस मनाये
जो संग है उन्हें संभाले
जो रूठे हैं उन्हें मनाये
गैरो के कुछ करीब जाए
क्या हिन्दू क्या मुस्लिम
सबको सबके करीब लाये
धर्म मजहब की नफरत भरी
ऊँची दीवारो को कमजोर बनाये
फाड़ दो पन्ने अपनी किताबो के
जो मानव से मानवता का क़त्ल कराये
तोड़ तो खुद ही अपने बुतख़ानो को
जो इंसानो को इंसानो से अछूत बनाये
चलो काल्पनिक ईश्वर की छाप मिटाये
प्रेम ,नैतिकता, मानवता जीवन में लाये
पाखंड अन्धविश्वास समाज से हटाये
आओ नास्तिकता की तरफ कदम बढ़ाये
- केशव (संजय)