शुक्रवार, 14 जुलाई 2017

गुजरा हूँ उन कूंचों से

Abhay Vivek Aggroia added 9 new photos.

गुजरा हूँ उन कूंचों से--
इंसां मर रहे हैं और हमें समझा रहे हैं की यह हिन्दू मरा , वह मुस्लिम मरा---
पोस्टमार्टम करने से पता चला की एक के दिल में राम थे और दूसरे के दिल में अल्लाह . और डॉक्टर ने रिपोर्ट में कहा यह हिन्दू का शव है और यह मुस्लिम का .
रासायनिक जाँच के लिए फिर उनके कुछ द्रव भेजे --लॅबोरेटरी में पाया गया एक में वेदों का रस था और एक में कुरान का.
अंगों को भी जाँच के लिए भेजा गया तो पाया गया एक में मंदिर है तो दूसरे में मस्जिद
सब साबित होने के बाद राजनैतिक नेताओं ने सच्चाई पेश की --इस देश में हिन्दुओं के लिए कोई जगह नहीं है-तो दूसरों ने कहा इस देश में मुस्लिमो की कोई जगह नहीं
जब एक दूसरों में इतना फर्क है तो उनकी पहचान और जान बचाने के लिए पंडितों और मौल्विओं ने अपने अपने भाषण देने शुरू किये 
सच्चाई पेश की गयी -एक गाय को बचाना है तो दूसरे सूअरों से घृणा करना--इसके इलावा जीवन कुछ ही नहीं है.
इसको सही सही अंजाम देने के लिए लड़ाकू संघठन बन गए 
एक अपनों को बचाने के लिए राम और अल्लाह के नारों के बीच धरती लाल होकर पुकारने लगी --रोते रोते बोली --तुम ऊपर बैठे तमाशा देख कर मुझे क्यों लहू लुहान कर रहे हो.
ऊपर से आवाज़ आयी --जब तक हम हैं ये खेल तो चलता ही रहेगा .
न जाने क्यों लोग एक दूसरे पर दोष लगाते हैं --जब तक ऊपर वाला हम सब की खबर और रक्षा और पालन कर रहा है तो यह खून खराबा भी तो अपने राम और अल्लाह को बचाने के लिए ही तो है-
इनके खिलाफ तो दूर की बात --अगर कहो मुझे जगरातों और मंदिर की आवाज़ों और अज़ान के बोलों से आपति है -- तो उसे संसार छोड़ ऊपर भेज दिया जायेगा --और राम और अल्लाह आपस में तय कर लेंगे-यह हिन्दू है या मुस्लिम --उनके पास तो सब से उत्तम प्रयोगशालाएं होंगी --मेरा तो यही मानना है .
मुझे बहुत घृणा होती है -जब कोई बेरोज़गारी, बेबसी , बेइज़्ज़त, कुपोषण , झुग्गी झोंपड़ी में पलते इंसान की खाल की मजबूरियां , बलात्कार , सूखा, बाढ़ से बर्बादी , भुखमरी के मुद्दे हूठाटे है --पापी हैं वो --उनको सबक सिखाने के लिए पुलिस तंत्र ,जेलों और अदालत और गुंडों की फौज तो है --यही तो देश द्रोही हैं --अगर इनको कुचल नहीं देंगे तो समाज और धर्म और राम और अल्लाह सब खत्म हो जायेगा-त्राहि त्राहि हो जाएगी---आओ और खून बहाएं और अपने धर्म का झंडा ऊपर लहराता रखें -

गुजरा हूँ उन कूंचों से जहाँ हवा में किसी मानस के जलने की ख़ुशबि से सरे बस्ती में महक है 
मुक्ति हो गई है जलती इमारतों में झुलस रही लाशें अल्लाह ईश्वर को इन से मिलने की तड़प है

===============अभय ===================
असली मुद्दों की लड़ाई के लिए जनजीवन को एकजुट कर एक लंबे संघर्ष से ही शोषण से मुक्ति मिल सकती है
-समझें और सामझाएं ------ पहल करें ------पहिये का रुख बदलने का
मुश्किल है ------------नामुमकिन तो नही
जागो, मेरे भाई जागो Join: Jago, Mere Bhai Jago
शामिल हों : बदलाव की लड़ाई और तमन्ना
शामिल हों :रुके नही कदम , अब जागे हैं हम ( Unstoppable Struggle To Change The System )
शामिल हों : एक दिशा या राह ----Ek disha ya raah

गुजरा हूँ उन कूंचों से--

Abhay Vivek Aggroia added 10 new photos.

गुजरा हूँ उन कूंचों से--
इंसां मर रहे हैं और हमें समझा रहे हैं की यह हिन्दू मरा , वह मुस्लिम मरा---
पोस्टमार्टम करने से पता चला की एक के दिल में राम थे और दूसरे के दिल में अल्लाह . और डॉक्टर ने रिपोर्ट में कहा यह हिन्दू का शव है और यह मुस्लिम का .
रासायनिक जाँच के लिए फिर उनके कुछ द्रव भेजे --लॅबोरेटरी में पाया गया एक में वेदों का रस था और एक में कुरान का.
अंगों को भी जाँच के लिए भेजा गया तो पाया गया एक में मंदिर है तो दूसरे में मस्जिद
सब साबित होने के बाद राजनैतिक नेताओं ने सच्चाई पेश की --इस देश में हिन्दुओं के लिए कोई जगह नहीं है-तो दूसरों ने कहा इस देश में मुस्लिमो की कोई जगह नहीं
जब एक दूसरों में इतना फर्क है तो उनकी पहचान और जान बचाने के लिए पंडितों और मौल्विओं ने अपने अपने भाषण देने शुरू किये 
सच्चाई पेश की गयी -एक गाय को बचाना है तो दूसरे सूअरों से घृणा करना--इसके इलावा जीवन कुछ ही नहीं है.
इसको सही सही अंजाम देने के लिए लड़ाकू संघठन बन गए 
एक अपनों को बचाने के लिए राम और अल्लाह के नारों के बीच धरती लाल होकर पुकारने लगी --रोते रोते बोली --तुम ऊपर बैठे तमाशा देख कर मुझे क्यों लहू लुहान कर रहे हो.
ऊपर से आवाज़ आयी --जब तक हम हैं ये खेल तो चलता ही रहेगा .
न जाने क्यों लोग एक दूसरे पर दोष लगाते हैं --जब तक ऊपर वाला हम सब की खबर और रक्षा और पालन कर रहा है तो यह खून खराबा भी तो अपने राम और अल्लाह को बचाने के लिए ही तो है-
इनके खिलाफ तो दूर की बात --अगर कहो मुझे जगरातों और मंदिर की आवाज़ों और अज़ान के बोलों से आपति है -- तो उसे संसार छोड़ ऊपर भेज दिया जायेगा --और राम और अल्लाह आपस में तय कर लेंगे-यह हिन्दू है या मुस्लिम --उनके पास तो सब से उत्तम प्रयोगशालाएं होंगी --मेरा तो यही मानना है .
मुझे बहुत घृणा होती है -जब कोई बेरोज़गारी, बेबसी , बेइज़्ज़त, कुपोषण , झुग्गी झोंपड़ी में पलते इंसान की खाल की मजबूरियां , बलात्कार , सूखा, बाढ़ से बर्बादी , भुखमरी के मुद्दे हूठाटे है --पापी हैं वो --उनको सबक सिखाने के लिए पुलिस तंत्र ,जेलों और अदालत और गुंडों की फौज तो है --यही तो देश द्रोही हैं --अगर इनको कुचल नहीं देंगे तो समाज और धर्म और राम और अल्लाह सब खत्म हो जायेगा-त्राहि त्राहि हो जाएगी---आओ और खून बहाएं और अपने धर्म का झंडा ऊपर लहराता रखें -

गुजरा हूँ उन कूंचों से जहाँ हवा में किसी मानस के जलने की ख़ुशबि से सरे बस्ती में महक है 
मुक्ति हो गई है जलती इमारतों में झुलस रही लाशें अल्लाह ईश्वर को इन से मिलने की तड़प है

===============अभय ===================
असली मुद्दों की लड़ाई के लिए जनजीवन को एकजुट कर एक लंबे संघर्ष से ही शोषण से मुक्ति मिल सकती है
-समझें और सामझाएं ------ पहल करें ------पहिये का रुख बदलने का
मुश्किल है ------------नामुमकिन तो नही
जागो, मेरे भाई जागो Join: Jago, Mere Bhai Jago
शामिल हों : बदलाव की लड़ाई और तमन्ना
शामिल हों :रुके नही कदम , अब जागे हैं हम ( Unstoppable Struggle To Change The System )
शामिल हों : एक दिशा या राह ----Ek disha ya raah

अजब गजब हमारा विज्ञान

... अजब गजब हमारा  विज्ञान...
           **************
शिवलिंग की वैज्ञानिकता ....
भारत का रेडियोएक्टिविटी मैप उठा लें, तब हैरान हो जायेगें ! भारत सरकार के नुक्लियर रिएक्टर के अलावा सभी ज्योतिर्लिंगों के स्थानों पर सबसे ज्यादा रेडिएशन पाया जाता है।

शिवलिंग और कुछ नहीं बल्कि न्यूक्लियर रिएक्टर्स ही हैं, तभी तो उन पर जल चढ़ाया जाता है ताकि वो शांत रहे।

महादेव के सभी प्रिय पदार्थ जैसे किए बिल्व पत्र, आक, आकमद, धतूरा, गुड़हल, आदि सभी न्यूक्लिअर एनर्जी सोखने वाले है।

  क्यूंकि शिवलिंग पर चढ़ा पानी भी रिएक्टिव हो जाता है इसीलिए तो जल निकासी नलिका को लांघा नहीं जाता।

  भाभा एटॉमिक रिएक्टर का डिज़ाइन भी शिवलिंग की तरह ही है।

शिवलिंग पर चढ़ाया हुआ जल नदी के बहते हुए जल के साथ मिलकर औषधि का रूप ले लेता है।

  तभी तो हमारे पूर्वज हम लोगों से कहते थे कि महादेव शिवशंकर अगर नाराज हो जाएंगे तो प्रलय आ जाएगी।

  ध्यान दें, कि हमारी परम्पराओं के पीछे कितना गहन विज्ञान छिपा हुआ है।

  जिस संस्कृति की कोख से हमने जन्म लिया है, वो तो चिर सनातन है।विज्ञान को परम्पराओं का जामा इसलिए पहनाया गया है ताकि वो प्रचलन बन जाए और हम भारतवासी सदा वैज्ञानिक जीवन जीते रहें।..
Copied

धर्मों को खतरा किससे

Narendra Tomar > ‎नास्तिक The Atheist

क्‍या यह अजीब नहीं लगता कि भारतीय संस्‍कृति (हिंदू संस्‍कृति पढिये) और इस्‍लाम को सारा खतरा इस बात से ही क्‍यों पैदा होता है कि महिलाएं क्‍या और क्‍यों पहनती है , क्‍या और कहां खातीपीती हैं और कब कहां आती जाती है वगैरह?
इन धर्मों को कभी कोई खतरा पुरूषों के व्‍यक्तिगत और सामाजिक व्‍यवहार से क्‍यों नहीं होता है ?

श्रावण सोमवार

Purnendu Goswami

आज श्रावण का पहला सोमवार है और हिन्दू धर्म की धार्मिक लड़कियाँ व्रत शुरू करेगी ताकि व्रत से प्रसन्न हो कर शिव उन्हें अच्छा वर दें में ऐसी कई लड़कियों को जानता हूँ जिन्होंने ये व्रत किये और उन्हें जैसा वो चाहती थी वैसा वर नहीं मिला । और कल से हर शिव मन्दिर में सैकड़ों हजारों लीटर दूध शिव के ऊपर चढ़ाया जाएगा जो की नाली के रास्ते होता हुआ सीवर में जायेगा और उसी शिव मन्दिर के बाहर आपको तमाम भिखारी मिल जाएंगे जो आपसे अपने भूखे बच्चे के लिए खाना माँगते मिल जाएँगे पर उनकी तरफ ध्यान नहीं जाएगा आखिर इंसान से बड़ा पेट भगवान का जो है चाहे जितना भर दो कभी नहीं भरेगा और ये भिखारी क्या देंगे जो आप लोगों के तथाकथित भगवान देंगे लड़कियों को अच्छा वर घर की सुख समृद्धि ये भिखारी थोड़ी दे सकता है ये तो भगवान देगा ये वो भगवान है जो इसके मन्दिर के बाहर बैठे भिखारी से ज्यादा भूखा और लालची है चाहे जितना दे दो कभी पेट नहीं भरेगा अरे इससे अच्छे तो वो इन्सान है जो अपने घर में बचे हुए खाने को किसी भूखे को खिला देते है पर मन्दिर में बैठा ये भगवान अपने ऊपर हजारों लीटर दूध चढ़वा कर नाली के रास्ते सीवर में बहा देगा पर किसी भूखे बच्चे की भूख नहीं मिटायेगा ।

मानव का धर्म

R Krishnan Sharma

अनाथालय मे पलने वाले बच्चे का कौन सा धर्म होता है। उसे जो भी धर्म वाले गोद लेता वह उसी धर्म जाति का हो जाता है !इसलीए मानव का कोई धर्म नही , जन्म लेने के बाद धर्म और जाति का मुहर लगता है !

हम घटिया होते जा रहे हैं|

Nikhilesh Mishra

अमरनाथ यात्रियों को ही नही असँख्य निर्दोषों को... असँख्य दीन-हीन हिंदुओं, मुस्लिमों, ईसाईयों, सिखों, यहूदियों, बौद्धों, जैनियों और नास्तिकों को हमने मारा है और इन मौतों की जिम्मेदारी अपने सिर लेकर गलतियों को ठीक करने के बदले नॉट इन माई नेम का बैनर उठाकर खुद को सबसे अलग कर लेने की हर सम्भव कोशिश ने सारी हत्याएँ की हैं।

मुट्ठी भर आतंकी मुस्लिम, करोड़ो अमन पसंद मुस्लिमों के प्रतिरोध के होते सफल हो ही नही सकते। या तो मुस्लिमों का चुप चाप समर्थन इन्हें हाँसिल है या इन्हें कोई फर्क नही पड़ता या आतंकी मुस्लिमों को छोड़ बाकी सब कमजोर हैं।

और...

मुट्ठी भर गौ रक्षक ( नर भक्षक ) का गली गली लोगों की जान बर्बरता... क्रूरता से ले लेना। ये तिलकधारी आतंकी करोड़ों अमन पसंद हिंदुओं के प्रतिरोध के होते सफल नही हो सकते। या तो हिंदुओं का चुपचाप समर्थन इन्हें हाँसिल है या इन्हें कोई फर्क नही पड़ता या गौ आतंकियों को छोड़ सारे हिन्दू कमजोर हैं।

हम दिन प्रतिदिन घटिया होते जा रहे हैं।

.................पंकज कुमार

गुरुवार, 13 जुलाई 2017

आतंकवाद का धर्म

Mithilesh K Sinha

"आतंकवादी का कोई धर्म नहीं होता" अपने आपमें एक कुतर्क है धर्म बचाने का, वरना उसके जनाजे में न तो धार्मिक हुजूम उमड़ता न तो रीती-रिवाज से उसका अंतिम संस्कार!

बुधवार, 12 जुलाई 2017

गांधी जी

अरुण जैन

महात्मा गांधी की प्रतीमा 130 देशो मे लगी हे
मोदी जी से पूछ लो पूरी
दुनिया घूम लिये , कहीं किसी देश में ,
#गोड़से की प्रतिमा मिली क्या ???

धर्म में संशोधन परिवर्तन

अपने धर्म के प्रत्येक विंदु पर , हर पहलू पर विचार करना चाहिए| आवश्यकतानुसार संशोधन करना चाहिए| बहुत परिवर्तन की जरुरत हो तो पूरा बदल कर नया बनाना चाहिए|

मंगलवार, 11 जुलाई 2017

नोबल से पुरष्कृत अधिकतर यहूदी

Pratik Bhoi

*105 वर्षो में 129 नोबल पुरस्कार जीत चुके है यहूदी !!*

विश्व की कुल आबादी में से यहूदियों की संख्या लगभग डेढ़ करोड़ है, जिसमें से लगभग 70 लाख अमेरिका में रहते हैं, 50 लाख यहूदी एशिया में, 20 लाख यूरोप में और बाकी कुछ अन्य देशों में रहते हैं… कहने का मतलब यह कि इज़राईल को छोड़कर सभी देशों में वे “अल्पसंख्यक” हैं !!

प्रख्यात वैज्ञानिक अल्बर्ट आईन्स्टीन एक यहूदी थे, प्रसिद्ध मनोविज्ञानी सिगमण्ड फ़्रायड, मार्क्सवादी विचारधारा के जनक कार्ल मार्क्स जैसे अनेकों यहूदी, इतिहास में अपना नाम दर्ज करा चुके हैं जिन्होंने मानवता और समाज के लिये एक अमिट योगदान दिया है। बेंजामिन रूबिन ने मानवता को इंजेक्शन की सुई दी, जोनास सैक ने पोलियो वैक्सीन दिया, गर्ट्र्यूड इलियन ने ल्यूकेमिया जैसे रोग से लड़ने की दवाई निर्मित की, बारुच ब्लूमबर्ग ने हेपेटाइटिस बी से लड़ने का टीका बनाया, पॉल एल्हरिच ने सिफ़लिस का इलाज खोजा, बर्नार्ड काट्ज़ ने न्यूरो मस्कुलर के लिये नोबल जीता, ग्रेगरी पिंकस ने सबसे पहली मौखिक गर्भनिरोधक गोली का आविष्कार किया, विल्लेम कॉफ़ ने किडनी डायलिसिस की मशीन बनाई… इस प्रकार के दसियों उदाहरण गिनाये जा सकते हैं जिसमें यहूदियों ने अपनी बुद्धिमत्ता और गुणों से मानवता की अतुलनीय सेवा की है।

पिछले 105 वर्षों में 129 यहूदियों को नोबल पुरस्कार मिल चुके हैं, भारत को अब तक सिर्फ़ 6 नोबल पुरस्कार मिले हैं, जिसमें से एक साहित्य (टैगोर) और एक शान्ति के लिये (मदर टेरेसा को, यदि उन्हें भारतीय माना जाये तो), ऐसे में विश्व में जिस प्रजाति की जनसंख्या सिर्फ़ दशमलव दो प्रतिशत हो ऐसे यहूदियों ने अर्थशास्त्र, दवा-रसायन खोज और भौतिकी के क्षेत्रों में नोबल पुरस्कारों की झड़ी लगा दी है, क्या यह वन्दनीय नहीं है?

मानव जाति की सेवा सिर्फ़ मेडिसिन से ही नहीं होती और भी कई क्षेत्र हैं, जैसे पीटर शुल्ट्ज़ ने ऑप्टिकल फ़ायबर बनाया, बेनो स्ट्रॉस ने स्टेनलेस स्टील, एमाइल बर्लिनर ने टेलीफ़ोन माइक्रोफ़ोन, चार्ल्स गिन्सबर्ग ने वीडियो टेप रिकॉर्डर, स्टैनली मेज़ोर ने पहली माइक्रोप्रोसेसरचिप जैसे आविष्कार किये। व्यापार के क्षेत्र में राल्फ़ लॉरेन (पोलो), लेविस स्ट्रॉस (लेविस जीन्स), सर्गेई ब्रिन (गूगल), माइकल डेल (डेल कम्प्यूटर), लैरी एलिसन (ओरेकल), राजनीति और अर्थशास्त्र के क्षेत्र में येल यूनिवर्सिटी के अध्यक्ष रिचर्ड लेविन, अमरीकी सीनेटर हेनरी किसींजर, ब्रिटेन के लेखक बेंजामिन डिज़रायली जैसे कई नाम यहूदी हैं।

मानवता के सबसे बड़े प्रेमी अपनी चार अरब डॉलर से अधिक सम्पत्ति विज्ञान और विश्व भर के विश्वविद्यालयों को दान करने वाले जॉर्ज सोरोस भी यहूदी हैं। ओलम्पिक में सात स्वर्ण जीतने वाले तैराक मार्क स्पिट्ज़, सबसे कम उम्र में विंबलडन जीतने वाले बूम-बूम बोरिस बेकर भी यहूदी हैं। हॉलीवुड की स्थापना ही एक तरह से यहूदियों द्वारा की गई है ऐसा कहा जा सकता है, हैरिसन फ़ोर्ड, माइकल डगलस, डस्टिन हॉफ़मैन, कैरी ग्राण्ट, पॉल न्यूमैन, गोल्डी हॉन, स्टीवन स्पीलबर्ग, मेल ब्रुक्स जैसे हजारों प्रतिभाशाली यहूदी हैं। आप दिन-रात जिस फेसबुक पर रमे रहते हैं, वह भी एक यहूदी अर्थात मार्क जुकरबर्ग का ही है !!

हमारे वेदों को नोबल पुरष्कार

काश हमारे वेदों में विज्ञान और विभिन्न तंत्र मंत्र यंत्र ..रक्षा कवच यंत्र, महा लक्ष्मी महा यंत्र, वशीकरण मंत्र, महा मृत्युंजय मंत्र,........,...... आदि के लिए भी नोबल पुरष्कार मिलता|
*********

भाग्य ओर अंधविश्वास

Suresh Katariya

इंसान ही इंसान के काम आ सकता है भाग्य के भरोसे तो अंधविश्वासी लोग रहते है

प्रचार प्रसार के शिकार हैं हम

Manish Chouhan

हम सभी किसी तरह के प्रचार के शिकार है। अगर हिन्दू घर में पैदा हुए हैं, तो एक तरह के प्रपोगेंडिस्ट हवा में हमको बनया गया है। जैन घर में पैदा हुए, दूसरी तरह की; ईसाई घर में तीसरी तरह की ….रूस में पैदा हो जाए तो एक चोथे तरह की हवा में आपका निर्माण होगा। और आप यही समझेंगे कि, यह जो प्रचार ने आपको सिखा दिया, यह आपका है। जब तक आप यह समझते रहेगें कि प्रचार जो सिखाता है वह आपका है, तब तक आप शास्त्रों से मुक्त नही हो सकते। और जो आदमी प्रपोगेण्डा और प्रचार से मुक्त नही होता, वह कभी सत्य को उपलब्ध नही हो सकता है।
और प्रचार के सूत्र एक जैसे हैं- चाहे लक्स टायलेट साबुन बेचनी हो, चाहे कुरान दोनेा में कोई फर्क नहीं है। advertisement का रास्ता एक ही है, प्रपोंगेडा का रास्ता और सूत्र एक ही है। धर्मगुरु बहुत चालाक लोग थे, उन्हे ये सूत्र पहले पता चल गए, व्यापारियों को बहुत बाद में पता चले। रेडियों पर रोज दोहराया जाता हैं कि सुन्दर चेहरा बनाना हो तो फला-फला अभिनेत्री लक्स टायलेट का उपयोग करती है। अभिनेत्री के चेहरे में और लक्स टायलेट में एक संबंध जोडने की कोशिश की जाती है।
अगर सत्य को पाना हो, तो फंला-फंला .ऋषि रामायण को पढकर सत्य पा गए। ऋषि में और रामायण मे सत्य जोडने की कोशिश की जाती है। यह वही कोशिश हैं, जो अभिनेत्री और लक्स टॉयलेट में की जाती है, अगर सुन्दर होना हो तो लक्स टॉयलेट खरीद लीजिये, और अगर सत्य पाना हो तो फलां-फलां ऋषि ने फलां-फलां किताब से पाया, आप भी उस किताब को खरीद लीजिये! उसके भक्त हो जाइये ! फिर रोज-रोज दोहराने से आदमी का चित्त इतना कमजोर है की रिपीरटिशन को वह भूल जाता है की यह क्या हो रहा है रोज रोज दोहराया जाता है |
आपको पता भी नहीं है, रास्ते पर निकलते है लक्स टॉयलेट सबसे अच्छा साबुन है, दरवाजे पर लिखा हुआ है, अख़बार खोलते हैं, लक्स टॉयलेट सबसे अच्छा साबुन है, रेडियो चलाते है, लक्स टॉयलेट सबसे अच्छा साबुन हैं, रोज.रोज सुनते है |
जब एक दिन आप बाजार में जाते है दुकान पर साबुन खरीदने को आप कहते हैं मुझे लक्स टॉयलेट साबुन चाहिए, और आपको पता नहीं की यह आप नहीं कह रहे हैं, आप से कहलवाया जा रहा है, आपको लक्स टॉयलेट का पता भी नहीं था |
एक प्रपोगैंडा आपके चारों तरफ हो रहा है और आपके मूह से, आपके कान में आवाज़ डाली जा रही है बार-बार जो की एक दिन आपके मूह से निकलनी शुरू हो जाएगी, और आप इस भ्रम में होंगे की मैंने लक्स टॉयलेट साबुन ख़रीदा, आपसे खरीदवा लिया गया और जो लक्स टॉयलेट के सबंध में सही है, वही कुरान, बाइबिल, वेद, उपनिषद् के सम्बन्ध में भी सही है, हम अदभुत रूप से प्रचार के शिकार हैं | 

तर्क वितर्क

तर्क वितर्क से सत्य उद्घाटित होता है| श्रद्धा भक्ति से नहीं|
अदालतों में दोनों पक्षों तो मौका दिया जाता है|

नफरतों को जलाओ

नफरतों को जलाओ …

मुहब्बत की रौशनी होगी । …. 
इंसान तो जब भी जले …

राख ही हुऐ ।।

इंसान एक परिन्दा

Arvind jaisawal-

पाप धोने की एजेंसी

कुछ भगवान के एजेंट अपराध पाप धोने की एजेंसी चलाते हैं|

सोमवार, 10 जुलाई 2017

मांसाहार का औचित्य

Narayan Nande

हमारे देश मांसाहार अपनाने वाले अधिकांश लोग कुछ दिन विशेष (जैसे सोमवार, मंगलवार, बृहस्पतिवार आदि) कुछ तिथि विशेष (जैसे एकादशी आदि), कुछ माह विशेष (जैसे श्रावण, कार्तिक, बैशाख, पितृ-पक्ष आदि) तथा कुछ पर्व विशेष (जैसे राम नवमी तथा जन्माष्टमी और दीपावली आदि) पर मांसाहारी भोजन का प्रयोग नहीं करते ।
इसका क्या कारण है ।
क्या मांसाहारी भोजन करना हमारी धार्मिक भावनाओं के विरुद्ध है ?
और यदि हमारी धार्मिक भावनाओं के विरुद्ध है तो वर्ष भर के अन्य दिनों में यह कैसे जायज है ?

कचरा

बचपन से ही मस्तिष्क में भरे गए कचरे की सफाई करने से लोग नास्तिक बन जाते हैं| इससे आस्था धर्म के दुकानदारों का नुकसान होता है|
यह बात भगत सिंह बहुत कम उम्र में समझ गए थे|

आतंकवाद

मुर्खता + भक्ति = पागलपन = आतंकवाद

कोई आस्तिक पैदा नहीं होता

अल्लाह ईश्वर के बारे में बचपन से पढ़ाया सिखाया रटाया जाता है| कोई बच्चा आस्तिक होकर पैदा नहीं होता |

रविवार, 9 जुलाई 2017

भरोसा

आस्तिक जो भगवान पर पूरा भरोसा करते हैं वे ऐसा नहीं करते|
***"
facebook
S.l. Patel _
बैंक वाले..
पेन बांधकर रखते हैं
मेडिकल स्टोर वाले..
कैंची बांधकर रखते है
झेरॉक्स वाले..
स्टेपलर बांधकर रखते है
प्याऊ वाले..
ग्लास बांधकर रखते हैं
कचहरी में वकील ....
कुर्सियां बांध कर रखते ह
बड़े बड़े घर वाले..
कुत्ता बांधकर रखते हैं
लड़कियाँ..
मुंह बांधकर रखती हैं।
और..
पत्नियां...
पति को बांधकर रखती है !!
किसी को किसी पर..
भरोसा ही नहीं ??
! कैसा घोर कलयुग आ गया रे बाबा

ईश्वर क्या है? कौन है?

Ram Bahadur Pandey

ईश्वर क्या है?
💐💐💐💐💐
इस विषय पर कई मित्रों के बीच गरमा गरम बहस चल रही है । इसे कुछ मित्र गण अपराध की श्रेणी में लेकर ऊट पटांग बाते करते हैँ , जो मेरी राय से उचित नही है । मैंने तो अपने अल्प अध्ययन एवं चिन्तन मनन से यही जाना है कि हिन्दू धर्म , विश्व के अन्य धर्मो से उदार और सुसंस्कृत इसी लिए रहा है , क्योंकि हमारे यहां सदैव धर्म पर , ईश्वर पर , करणीय और अकरणीय पर तर्क करने की स्वतन्त्रता ही नही रही , बल्कि दो चिन्तकों के बीच आमने सामने बहस भी होती थी , और इसी को "शास्त्रार्थ " कहा जाता था । 
इतिहास गवाह है कि ईसामसीह और सुकरात ने ईसाई धर्म की या ओल्ड टेस्टामेन्ट ( ईशाई धर्म शास्त्र ) की इतनी आलोचना नही की , जितनी हमारे यहां बुद्ध और महावीर ने वैदिक धर्म ग्रन्थों की किया था । अब सोचिए कि बुद्ध महावीर पश्चिम में होते तो , क्या बच पाते ?
हमारे यहां आडम्बर , कर्मकाण्ड और कट्टरता की शुरुआत पौराणिक युग से हुई और तभी से तत्कलिक ज्ञान विज्ञान के आधार पर जनहित में बनाए गए नियमों , जो धर्म के नाम से जाने जाते थे ,में कट्टरता का समावेश हुआ । 
कालान्तर में पश्चिम के कुछ वैज्ञानिकों जैसे गैलीलियो , कापरनिक्स आदि ने अपनी शोध से सिद्ध किया कि धर्मशास्त्रों में लिखी सारी बातें सत्य नही हैं । यद्यपि कि इनका शोध (आविष्कार ) सत्य था , परन्तु धर्म सम्मति न होने के कारण पोप पादरियों ने इन वैज्ञानिकों को कठोर यातना और दण्ड तो दिए , लेकिन बाद में इनकी शोधों से सबक लेकर अन्धानुकरण बन्द कर उत्तर आधुनिक काल की ओर अग्रसर हुए । 
हमारा यह दुर्भाग्य रहा है कि हमें इतिहास से , जो सबक लेना चाहिए था वह आज तक नही लिया जिसके कारण पूर्व में हम हजारों वर्ष गुलाम तो रहे ही ,और आज भी उत्तर आधुनिक काल की दौड़ में पीछे हो गए हैँ । शास्त्रों की , कथित धर्माचारियों की सैकडों बातें असत्य सिद्ध होने के बाद भी , उनका अन्धानुकरण तथा "लकीर का फकीर " बने रहना हमारे पिछड़ने का मुख्य कारण आज भी बना हुआ है ।
सम्पूर्ण अस्तित्व एक जीवन्त देह की भांति काम करता है ।प्रत्येक चीज अन्य हर चीज से सम्बंधित है । अस्तित्व स्वशासित है , और जो हो रहा है ,स्वत:स्फूर्त है । यह लोगों को समझ से परे लगा कि इतना बड़ा ब्रह्माण्ड बिना किसी स्रष्टा के कैसे अस्तित्व में आया , और विना किसी नियन्ता के , चल कैसे रहा है ? जब चिन्तन मनन करके चूर हो गए और अपनी कल्पना तथा तर्क शक्ति से इस रहस्य को जानने में नाकामयाब रहे , तो आत्म सन्तोष के लिए जिस शब्द का इस्तेमाल किया , उसी का नाम है " ईश्वर " ।
आदि काल में बहुत सी चीजों के विषय में न जान पाने के कारण ही हमने देवी , देवता , जादू , टोना , जन्तर मन्तर आदि की अवधारणा की थी।जहां जहां से ज्यों ज्यों रहस्य की परतें हटती जा रही हैं , वहां वहां हमारी पूर्व नियोजित अवधारणाएं भी समाप्त होती जा रही हैँ । कहने का तात्पर्य यह कि , किसी चीज को अन्तिम सत्य या अन्तिम खोज मान लेना ही प्रगति की सबसे बडी़ बाधा है । इस पर चर्चा शुरू रहनी चाहिए , बहस भी तार्किक ढंग होती रहनी चाहिए , क्योंकि " डिसकसन इज दि वेस्ट वे , फार नोइंग टु व्हाटिज राइट एन्ड व्हाटिज रांग "

शनिवार, 8 जुलाई 2017

जाति भेद

Natthu Ram Pradhan

संदीप कुमार_ जाति भेद
एक दिन पंडित को प्यास लगी, संयोगवश घर में पानी नही था इसलिए उसकी पत्नी पडोस से पानी ले आई I पानी पीकर पंडित ने पूछा....

पंडित - कहाँ से लायी हो बहुत ठंडा पानी है I

पत्नी - पडोस के कुम्हार के घर से I (पंडित ने यह सुनकर लोटा फैंक दिया और उसके तेवर चढ़ गए वह जोर जोर से चीखने लगा )

पंडित - अरी तूने तो मेरा धर्म भ्रष्ट कर दिया, कुंभार ( शुद्र ) के घर का पानी पिला दिया। पत्नी भय से थर-थर कांपने लगी, उसने पण्डित से माफ़ी मांग ली I 
पत्नी - अब ऐसी भूल नही होगी। शाम को पण्डित जब खाना खाने बैठा तो घरमे खानेके लिए
कुछ नहीं था.

पंडित - रोटी नहीं बनाई. भाजी
नहीं बनाई.

पत्नी - बनायी तो थी लेकिन अनाज पैदा करनेवाला कुणबी(शुद्र) था.
और जिस कढ़ाई में बनाया था वो लोहार (शुद्र) के घर से आई थी। सब फेक दिया.

पण्डित - तू पगली है क्या कही अनाज और कढ़ाई में भी छुत होती है? यह कह कर पण्डित बोला की पानी तो ले आओ I

पत्नी - पानी तो नही है जीI

पण्डित - घड़े कहाँ गए हैI

पत्नी - वो तो मेने फैंक दिए क्योंकि कुम्हार के हाथ से बने थेI पंडित बोला दूध ही ले आओ वही पीलूँगा I 
पत्नी - दूध भी फैंक दिया जी क्योंकि गाय को जिस नौकर ने दुहा था वो तो नीची (शुद्र) जाति से था न I

पंडित- हद कर दी तूने तो यह भी नही जानती की दूध में छूत नही लगती है I

पत्नी-यह कैसी छूत है जी जो पानी में तो लगती है, परन्तु दूध में नही लगती। पंडित के मन में आया कि दीवार से सर फोड़ ले। गुर्रा कर बोला - तूने मुझे चौपट कर दिया है जा अब आंगन में खाट डाल दे मुझे अब नींद आ रही है I

पत्नी- खाट! उसे तो मैने तोड़ कर फैंक दिया है क्योंकि उसे शुद्र (सुतार ) जात वाले ने बनाया था.

पंडित चीखा - ओ फुलो का हार लाओ भगवन को चढ़ाऊंगा ताकि तेरी अक्ल ठिकाने आये.

पत्नी- फेक दिया उसे माली(शुद्र)
जाती ने बनाया था.
पंडित चीखा- सब में आग लगा दो, घर में कुछ बचा भी हैं या नहीं.
पत्नी - हाँ यह घर बचा है, इसे अभी तोडना बाकी है क्योंकि इसे भी तो पिछड़ी जाति के मजदूरों ने बनाया है I पंडित के पास कोई जबाब नही था .उसकी अक्ल तो ठिकाने आयी
बाकी लोगोकी भी आ जायेगी सिर्फ 
इस कहानी आगे फॉरवर्ड करो हो सके देश मे जाती वाद खत्म हो जाये