इस पोस्ट में कही गई नियोग प्रथा यदि भारत में प्रचलित थी तो स्पष्ट है कि पहले अंतर्जातीय संबध/ विवाह समाज में मान्य था| शायद इसीलिए हमारे भारत के किसी भी एक जाति के लोग एक ही रंग के त्वचा वाले नहीं होते अर्थात गोरे काले सांवले होते हैं ।
जातियों में जातीय श्रेष्ठता का अहंकार बेकार है| अंतर्जातीय विवाह को समाज द्वारा मान्यता न देना उचित नहीं| मान्यता न दें तो सामाजिक बहिष्कार तो कदापि उचित नहीं है ।
सत्य को जानने की कोशिश करनी चाहिए. सत्य जानने के लिए उलट पुलट हर तरह के विचार पढ़ कर सोचना चाहिए. किसी लोखी गई या कही गई बात को आँख बंद कर नहीं मानना चाहिए. सत्य ही सुन्दर है. सत्य ही कल्याणकरी है.
मंगलवार, 23 जुलाई 2019
अन्तर्जातीय विवाह वाले का बहिष्कार
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