शनिवार, 12 अगस्त 2017

ईश्वर देवी देवता भूत प्रेत डायन अलग अलग खानदान के हैं?

Balendu Swami
यदि आप ईश्वर के अस्तित्व पर विश्वास करते हैं तो उन्हीं कारणों से भूत प्रेत, पिशाच, जिन्न और डायनों पर भी विश्वास करेंगे. और फिर जैसे कुछ लोगों का समूह श्रद्धा और आस्था के चलते किसी को भगवान बनाकर पूजा कर सकता है वैसे ही कुछ लोग किसी को डायन बताकर उसकी हत्या भी कर सकते हैं! बल्कि मैंने तो ऐसे भी बहुत से आस्तिक देखे हैं जिन्हें ईश्वर के अस्तित्व पर भले ही संदेह हो परन्तु भूत प्रेत, डायन इत्यादि के अस्तित्व पर पूरा भरोसा होता है! हालाँकि दोनों के अस्तित्व पर विश्वास करने के कारण, आधार और कुतर्क एक जैसे ही हैं!

पाखंड मिटाओ भारत बचाओ

हिंदू या मुस्लिम होकर मर जाते हैं

Avdhesh Nigam
मनुष्य होने की कोशिश में
हम धर्म से लिपट जाते हैं और
मनुष्यता से बहुत दूर चले जाते है
हिन्दू या मुसलमान बनकर मर जाते हैं |

लिखना शौक नहीं जिम्मेदारी

Suresh Soni
लिखना कोई शौक नहीं है , एक जिम्मेदारी है , मानवता के प्रति , समाज के प्रति , नैतिकता के प्रति।

गुरुवार, 10 अगस्त 2017

शरद कोरस की कविता

✝☪🕉☸☮

*शरद कोकास की एक कविता*
-----------

🛎 *ईश्वर नहीं आया* 🛎

*ईश्वर को याद किया उसने*
*सुख के दिनों में*
*आरती उतारी*
*प्रसाद बाँटा*
*व्रत रखे*
*कीर्तन करवाये*
*ताकि सनद रहे*
*वक़्त पर काम आये*

*आश्चर्य की बात है*
*वक़्त पड़ा तो ईश्वर नहीं आया*
*पाँच वक़्त के नमाज़ी थे*
*पड़ोस के रहमान चाचा*
*भोपाल गए थे*
*गैसकांड में गुज़र गए*
*हफ़्ते में सात व्रत रखते थे बाबा*
*सूखा पड़ा*
*तो भूख से मर गए*
*रोज़ जल चढ़ाती थी अम्मा*
*पिछली बाढ़ में बह गई*
*पूजा-प्रार्थना,घंटी-पोथी*
*धरी की धरी रह गई*

*वह जीवित रहा*
*भोगता रहा दुख*
*भोग लगाता रहा ईश्वर को*
*अपना पेट काटकर*
*ईश्वर के लिये*
*बिछौने का इंतज़ाम कर*
*खुद सोता रहा टाट पर*
*करता रहा जीवन भर*
*ईश्वर की प्रतीक्षा*

*ईश्वर होता तो आता*
*नहीं था सो नहीं आया ।*

🔲 *शरद कोकास* 🔲

😟😕🙁☹😙🤓

राहुल सांस्कृत्यायन के विचार _ कुमार संदीप


राहुल सांकृत्यायन (9 अप्रैल 1893) का जन्म गाय पट्टी (काउ बेल्ट) में एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था. वह वेदांती, आर्य समाजी होते हुए बौद्ध मतावलंबी बने. विद्रोही चेतना, न्यायबोध और जिज्ञासा वृति ने उन्हें पूरी तरह से ब्राह्मणवादी जातिवादी हिन्दू संस्कृति के खिलाफ खड़ा कर दिया. फुले और अम्बेडकर की तरह उन्हें जातिवादी अपमान का सामना तो नहीं करना पड़ा, लेकिन सनातनी हिन्दुओं की लाठियां जरूर खानी पड़ी. राहुल सांकृत्यायन अपने अपार शास्त्र ज्ञान और जीवन अनुभवों के चलते हिन्दुओं को सीधे ललकारते थे. उनकी पतनशीलता और गलाजत को उजागर करते थे. उन्होंने अपनी किताबों में विशेषकर ‘तुम्हारी क्षय’ में हिन्दुओं के समाज, धर्म, भगवान, सदाचार और जात-पांत की क्षय में हिंदुओं के अमानवीय चेहरे को बेनकाब किया है.

‘तुम्हारी जात- पांत की क्षय’ में वह लिखते है कि हमारे देश को जिन बातों पर अभिमान है, उनमें जात- पात भी एक है. …पिछले हजार बरस के अपने राजनीतिक इतिहास को यदि हम लें तो मालूम होता है कि भारतीय लोग विदेशियों से जो पददलित हुए, उसका प्रधान कारण जाति-भेद था. जाति-भेद न केवल लोगों को टुकड़ों- टुकड़ों में बांट देता है, बल्कि साथ ही यह सबके मन में ऊंच- नीच का भाव पैदा करता है. ब्राह्मण समझता है कि हम बड़े हैं; राजपूत छोटे हैं. राजपूत समझता है कि हम बड़े हैं; कहार छोटे हैं. कहार समझता है कि हम बड़े हैं; चमार छोटे हैं. चमार किसी और को छोटा समझता है और फिर वह ‘छोटा व्यक्ति’ भी किसी और को छोटा कह ही लेता है.’

राहुल सांकृत्यायन आधुनिकता की परियोजना के सभी तत्वों को अपने में समेटे हुए हैं. वे हिन्दू संस्कृति के मनुष्य विरोधी मूल्यों पर निर्णायक हमला तो करते ही हैं, वह यह भी मानते हैं कि मनुष्य को धर्म की कोई आवश्यकता नहीं हैं. इंसान वैज्ञानिक विचारों के आधार पर खूबसूरत समाज का निर्माण कर सकता है, एक बेहतर जिंदगी जी सकता है. सबसे बड़ी बात यह है कि वह उत्पादन संपत्ति संबंधों में क्रान्तिकारी परिवर्तन के हिमायती हैं. वह इस बात से पूरी तरह सहमत हैं कि भौतिक आधारों में क्रान्तिकारी परिवर्तन किए बिना राजनीतिक, सामाजिक-सांस्कृतिक संबंधों में क्रान्तिकारी परिवर्तन लाया नहीं जा सकता है और जो परिवर्तन लाया जायेगा, उसे टिकाए रखना मुश्किल होगा.

जाति के संबंध में भी उनकी यही धारणा थी. वे इस यांत्रिक और जड़सूत्रवादी सोच के विरोधी थे कि आधार में परिवर्तन से अपने आप जाति व्यवस्था टूट जाएगी. इसके साथ ही हिन्दी क्षेत्र में वो अकेले व्यक्ति थे जो ब्राह्मण होते हुए भी ब्राह्मणवादी हिन्दू धर्म-संस्कृति पर करारी चोट करते थे और भारत में सामंतवाद की विशिष्ट संरचना जाति को समझते थे और आधार और अधिरचना (जाति) दोनों के खिलाफ एक साथ निर्णायक संघर्ष के हिमायती थे. इस समझ को कायम करने में ब्राह्मण विरोधी बौद्ध धर्म के उनके गहन अध्ययन ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी. उनकी तीन किताबें ‘बौद्ध दर्शन’,  ‘दर्शन- दिग्दर्शन’ और ‘वैज्ञानिक भौतिकवाद’ इस दृष्टि से अत्यन्त महत्वपूर्ण हैं.

बुधवार, 9 अगस्त 2017

आओ तर्कशील बनें हम

Rohit Singh > ‎आओ तर्क करें
भारत एक धर्मनिरपेक्ष देश है????
1. सड़क का उद्दघाटन नारियल फोड़
कर ही क्यों होता है, नमाज़ पढ़ कर
या दुसरे धर्मों की विधि के अनुसार
क्यों नहीं??
2. थाने में मंदिर ही क्यों है, मस्जिद या दुसरे धर्मों के पूजा स्थल
क्यों नहीं??
3. सरकारी भवन निर्माण से पहले
भूमि पूजन ही क्यों होता है, दुसरे
धर्मों के अनुसार प्रार्थना क्यों नहीं ??
4. सरकरी कार्यालयों में गणेश की मूर्ति क्यों लगी रहती है,
दुसरे
धर्मों के प्रतीक क्यों नहीं ??
5. सरकारी स्कूलों में
सरस्वती पूजा ही क्यों होती है, दुसरे
धर्म के पर्व क्यों नहीं ??
6. सेना में राजपूत बटालियन है, शिख बटालियन है, मुस्लिम/
इसाई
बटालियन क्यों नहीं ???
7. न्यायलय में इंसाफ
की देवी होती दुसरे धर्मों के इंसाफ के
प्रतीक क्यों नहीं?? ये मेरे निजी सवाल है प्लीज इसे धर्म
से जोड़कर न देखा जाए ॥

जरा सोचें

Ahmed Kaleem
जिस देश में राजनीती, चुनाव मज़हब के आधार पर हो, क्या वो देश कभी विकास कर सकता है?

मानवता

मानवता ही सच्चा और सर्वोच्च धर्म है
गरमी का मौसम था, मैने सोचा काम पे जाने से पहले गन्ने का रस पीकर काम पर जाता हूँ।
एक छोटे से गन्ने की रस की दुकान पर गया। वह काफी भीड-भाड का इलाका था, वहीं पर काफी छोटी-छोटी फूलो की, पूजा की सामग्री ऐसी और कुछ दुकानें थीं। और सामने ही एक बडा मंदिर भी था , इसलिए उस इलाके में हमेशा भीड रहती है।
मैंने रस का आर्डर दिया , मेरी नजर पास में ही फूलों की दुकान पे गयी , वहीं पर एक सज्जन व्यक्ति ने 500 रूपयों वाले फूलों के हार बनाने का आर्डर दिया , तभी उस व्यक्ति के पिछे से एक 10 वर्षीय गरीब बालक ने आकर हाथ लगाकर उसे रस की पिलाने की गुजारिश की । पहले उस व्यक्ति का बच्चे के तरफ ध्यान नहीं था , जब देखा....
तब उस व्यक्ति ने उसे अपने से दूर किया और अपना हाथ रूमाल से साफ करते हुए
" चल हट ...."
कहते हुए भगाने की कोशिश की।
उस बच्चे ने भूख और प्यास का वास्ता दिया। वो भीख नहीं मांग रहा था , लेकिन उस व्यक्ति के दिल में दया नहीं आयी।
बच्चे की आँखें कुछ भरी और सहमी हुई थी, भूख और प्यास से लाचार दिख रहा था।
इतने में मेरा आर्डर दिया हुआ रस आ गया।
मैंने और एक रस का आर्डर दिया उस बच्चे को पास बुलाकर उसे भी रस पीलाया।
बच्चे ने रस पीया और मेरी तरफ बडे प्यार से देखा और मुस्कुराकर चला गया। उस की मुस्कान में मुझे भी खुशी और संतोष हुआ.......
लेकिन. ....वह व्यक्ति मेरी तरफ देख रहा था, जैसे कि उसके अहम को चोट लगी हो।
फिर मेरे करीब आकर कहा
" आप जैसे लोग ही इन भिखारियों को सिर चढाते है "
मैंने मुस्कराते हुए कहा
" आपको मंदिर के अंदर इंसान के व्दारा बनाई पत्थर की मूर्ति में ईश्वर नजर आता है, लेकिन ईश्वर द्वारा बनाए इंसान के अंदर ईश्वर नजर नहीं आता है..........
मुझे नहीं पता आपके 500 रूपये के हार से आपका मंदिर का भगवान मुस्करायेगा या नहीं, लेकिन मेरे 10 रूपये के चढावे से मैंने भगवान को मुस्कराते हुए देखा और मुझे संतुष्टी भी देकर गया है "

भगवान की पूजा किसी खास पदार्थो के चढावे से नहीं होती।सच्चे मन और प्रेम से की गई प्रार्थना से होती है।

हमे धार्मिक स्थानो पर दान करने से अच्छा यह है कि हम किसी गरीब या जरूरतमंद लोगों की मदत करना चाहिए।
यही सच्ची पुजा है।

दोस्तों अगर आप मेरे विचार से सहमत हैं तो जरूर यह पोस्ट आगे शेयर करे।

तुम एक तत्व वाले पत्थर की मूर्तियों को,पवित्र और दिव्य मान कर पूजते हो।परन्तु पांच तत्वों वाले को नीची जाती का कहकर,कई मनुष्यों को अपवित्र और नीच गिनते हो, और नफरत करते हो।क्या ऐसे जीव को इंसान कहना उचित होगा ? —

लंबा है। अवश्य पढें।

Girdhari Lakhani
मैं एक घर के करीब से गुज़र रहा था की अचानक से मुझे उस घर के अंदर से एक बच्चे की रोने की आवाज़ आई। उस बच्चे की आवाज़ में इतना दर्द था कि अंदर जा कर वह बच्चा क्यों रो रहा है, यह मालूम करने से मैं खुद को रोक ना सका।
अंदर जा कर मैने देखा कि एक माँ अपने दस साल के बेटे को आहिस्ता से मारती और बच्चे के साथ खुद भी रोने लगती। मैने आगे हो कर पूछा बहनजी आप इस छोटे से बच्चे को क्यों मार रही हो? जब कि आप खुद भी रोती हो।
उस ने जवाब दिया भाई साहब इस के पिताजी भगवान को प्यारे हो गए हैं और हम लोग बहुत ही गरीब हैं, उन के जाने के बाद मैं लोगों के घरों में काम करके घर और इस की पढ़ाई का खर्च बामुश्किल उठाती हूँ और यह कमबख्त स्कूल रोज़ाना देर से जाता है और रोज़ाना घर देर से आता है।
जाते हुए रास्ते मे कहीं खेल कूद में लग जाता है और पढ़ाई की तरफ ज़रा भी ध्यान नहीं देता है जिस की वजह से रोज़ाना अपनी स्कूल की वर्दी गन्दी कर लेता है। मैने बच्चे और उसकी माँ को जैसे तैसे थोड़ा समझाया और चल दिया।
इस घटना को कुछ दिन ही बीते थे की एक दिन सुबह सुबह कुछ काम से मैं सब्जी मंडी गया। तो अचानक मेरी नज़र उसी दस साल के बच्चे पर पड़ी जो रोज़ाना घर से मार खाता था। मैं क्या देखता हूँ कि वह बच्चा मंडी में घूम रहा है और जो दुकानदार अपनी दुकानों के लिए सब्ज़ी खरीद कर अपनी बोरियों में डालते तो उन से कोई सब्ज़ी ज़मीन पर गिर जाती थी वह बच्चा उसे फौरन उठा कर अपनी झोली में डाल लेता।
मैं यह नज़ारा देख कर परेशानी में सोच रहा था कि ये चक्कर क्या है, मैं उस बच्चे का चोरी चोरी पीछा करने लगा। जब उस की झोली सब्ज़ी से भर गई तो वह सड़क के किनारे बैठ कर उसे ऊंची ऊंची आवाज़ें लगा कर वह सब्जी बेचने लगा। मुंह पर मिट्टी गन्दी वर्दी और आंखों में नमी, ऐसा महसूस हो रहा था कि ऐसा दुकानदार ज़िन्दगी में पहली बार देख रहा हूँ ।
अचानक एक आदमी अपनी दुकान से उठा जिस की दुकान के सामने उस बच्चे ने अपनी नन्ही सी दुकान लगाई थी, उसने आते ही एक जोरदार लात मार कर उस नन्ही दुकान को एक ही झटके में रोड पर बिखेर दिया और बाज़ुओं से पकड़ कर उस बच्चे को भी उठा कर धक्का दे दिया।
वह बच्चा आंखों में आंसू लिए चुप चाप दोबारा अपनी सब्ज़ी को इकठ्ठा करने लगा और थोड़ी देर बाद अपनी सब्ज़ी एक दूसरे दुकान के सामने डरते डरते लगा ली। भला हो उस शख्स का जिस की दुकान के सामने इस बार उसने अपनी नन्ही दुकान लगाई उस शख्स ने बच्चे को कुछ नहीं कहा।
थोड़ी सी सब्ज़ी थी ऊपर से बाकी दुकानों से कम कीमत। जल्द ही बिक्री हो गयी, और वह बच्चा उठा और बाज़ार में एक कपड़े वाली दुकान में दाखिल हुआ और दुकानदार को वह पैसे देकर दुकान में पड़ा अपना स्कूल बैग उठाया और बिना कुछ कहे वापस स्कूल की और चल पड़ा। और मैं भी उस के पीछे पीछे चल रहा था।
बच्चे ने रास्ते में अपना मुंह धो कर स्कूल चल दिया। मै भी उस के पीछे स्कूल चला गया। जब वह बच्चा स्कूल गया तो एक घंटा लेट हो चुका था। जिस पर उस के टीचर ने डंडे से उसे खूब मारा। मैने जल्दी से जा कर टीचर को मना किया कि मासूम बच्चा है इसे मत मारो। टीचर कहने लगे कि यह रोज़ाना एक डेढ़ घण्टे लेट से ही आता है और मै रोज़ाना इसे सज़ा देता हूँ कि डर से स्कूल वक़्त पर आए और कई बार मै इस के घर पर भी खबर दे चुका हूँ।
खैर बच्चा मार खाने के बाद क्लास में बैठ कर पढ़ने लगा। मैने उसके टीचर का मोबाइल नम्बर लिया और घर की तरफ चल दिया। घर पहुंच कर एहसास हुआ कि जिस काम के लिए सब्ज़ी मंडी गया था वह तो भूल ही गया। मासूम बच्चे ने घर आ कर माँ से एक बार फिर मार खाई। सारी रात मेरा सर चकराता रहा।
सुबह उठकर फौरन बच्चे के टीचर को कॉल की कि मंडी टाइम हर हालत में मंडी पहुंचें। और वो मान गए। सूरज निकला और बच्चे का स्कूल जाने का वक़्त हुआ और बच्चा घर से सीधा मंडी अपनी नन्ही दुकान का इंतेज़ाम करने निकला। मैने उसके घर जाकर उसकी माँ को कहा कि बहनजी आप मेरे साथ चलो मै आपको बताता हूँ, आप का बेटा स्कूल क्यों देर से जाता है।
वह फौरन मेरे साथ मुंह में यह कहते हुए चल पड़ीं कि आज इस लड़के की मेरे हाथों खैर नही। छोडूंगी नहीं उसे आज। मंडी में लड़के का टीचर भी आ चुका था। हम तीनों ने मंडी की तीन जगहों पर पोजीशन संभाल ली, और उस लड़के को छुप कर देखने लगे। आज भी उसे काफी लोगों से डांट फटकार और धक्के खाने पड़े, और आखिरकार वह लड़का अपनी सब्ज़ी बेच कर कपड़े वाली दुकान पर चल दिया।
अचानक मेरी नज़र उसकी माँ पर पड़ी तो क्या देखता हूँ कि वह बहुत ही दर्द भरी सिसकियां लेकर लगा तार रो रही थी, और मैने फौरन उस के टीचर की तरफ देखा तो बहुत शिद्दत से उसके आंसू बह रहे थे। दोनो के रोने में मुझे ऐसा लग रहा था जैसे उन्हों ने किसी मासूम पर बहुत ज़ुल्म किया हो और आज उन को अपनी गलती का एहसास हो रहा हो।
उसकी माँ रोते रोते घर चली गय

ढोंग

Amita Ambedkar
ढोंगी बाबाओं और माताओं से ये देश इतना सम्मोहित कैसे हो जाता है? ये बहुत गजब की बात है. न सिर्फ अनपढ़ और अशिक्षित लोग बल्कि डिग्रीधारी और विश्वविद्यालयों में पढ़े लिखे लोग भी इस मूर्खता में शामिल हैं. मैंने कई उच्च शिक्षितों के घरों में नीबू मिर्ची लटकते हुए देखा है, वे रोज सोने से पहले एक झाडू से अपने बच्चों की नजर उतारते हैं, खाना खाने के लिए, नहाने के लिए, सोने के लिए जागने के लिए और हर काम के लिए उनके पास कोई मन्त्र होता है.
ऐसे सभी बाबाओ गुनियाओं ओझाओं का समाज पर इतना प्रभाव बना हुआ है. बचपन से ही मूर्खतापूर्ण शास्त्रों और कथाओं से बच्चों के मन में देवी देवता भूत प्रेत और चमत्कारों की बात बैठा दी जाती है. वे विज्ञान और तर्क सीख पायें इसके पहले ही बाबाजी उनके दिमाग में घुस जाते हैं.
इस धंधे को बंद करने का एक ही तरीका है. अपने बच्चों को इन बाबाओं गुरुओं से बचाइये. देवी देवताओं से बचाइये. हो सके तो उन्हें किसी पूजा, यज्ञ, हवन बलि और कथा पंडाल आदी से दूर रखिये. पहले खुद इस मूर्खता को समझिये और अपने बच्चों को समझाइये कि ये सब षड्यंत्र हैं जो तुम्हें कमजोर और डरपोक बनाने के लिए रचा गया है. आप देखेंगे एक बार बच्चा थोड़ा सा नास्तिक और निडर हो जाए उसके बाद उसमे वैज्ञानिक चेतना और तर्कशीलता का जन्म कितनी तेजी से होता है. एक नया ही व्यक्तित्व उसमे उभरता है.
आपको अगर बाबाओं, गुरुओं और माताओं का धंधा बंद करना है तो खुद नास्तिक बनिए और अपने बच्चों को भी इंसान बनाइये अपने बच्चों को किसी मूर्ख का भक्त होने से बचाना आपकी जिम्मेदारी है |
ये वो महिलायें हैं जो घर के बाहर हल्दी की छाप लगा रही है ताकि इनके बाल ना कटे अन्धविश्वास की भी कोई हद होती है यार 😡😡😡

आईना

Usha yadav

शनिवार, 5 अगस्त 2017

तर्क

RKrishnan Sharma
😀😀होशियार बच्चा और रामायण की कहानी, अवश्य पढ़ें। 😀😀
अध्यापक :-बच्चों रामचंद्र जी ने समुद्र पर पुल बनाने का निर्णय लिया
पप्पू :- सर मैं कुछ कहना चाहता हूँ।
अध्यापक :- कहो बेटा
पप्पू :- रामचंद्र जी का पुल बनाने का निर्णय गलत था।
अध्यापक :- वो कैसे।
पप्पू :- सर, उनके पास हनुमान थे
जो उडकर लंका जा सकते थे।
तो उनको पुल बनाने की कोई जरूरत नहीं थी
अध्यापक :- हनुमान ही तो उड़ना जानते थे बाकी रीछ और वानर तो नहीं उडते थे।
पप्पू :- सर वो हनुमान की पीठ पर बैठ कर जा सकते थे।
जब हनुमान पुरा पहाड़ उठाकर ले जा सकते थे।
तो.....
अध्यापक :- भगवान की लीला पर सवाल नहीं उठाया करते नालायक
पप्पू :- वैसे सर एक उपाय और था।
अध्यापक :- (गुस्से में ).....क्या ?
पप्पू :- सर, हनुमान अपने आकार को कितना भी छोटा बड़ा कर सकते थे
जैसे सुरसा के मुंह से निकलने के लिए छोटे हो गये थे और सूर्य को मुंह में लेते समय सूर्य से भी बडे..........
तो वो अपने आकार को भी तो समुद्र की चौडाई से बड़ा कर सकते थे और समुद्र के ऊपर लेट जाते।
और सारे बन्दर 🙊 हनुमान जी की पीठ से गुजरकर लंका पहुंच जाते और रामचंद्र को भी समुद्र की अनुनय विनय करने की जरूरत नहीं पड़ती।
वैसे सर एक बात और पूछूँ?
अध्यापक :- पूछो।
पप्पू :- सर सुना है।
समुन्द्र पर पुल बनाते समय वानरों ने पत्थर पर "राम" नाम लिखा था.....
जिससे वो पत्थर पानी 💧 में तैरने लगे।
अध्यापक :- हाँ तो ये सही है।
पप्पू :- सर, सवाल ये है बन्दर भालूओ को पढना लिखना किसने सिखाया था?
और श्री राम लिखे पत्थर तैर जाते थे लेकिन श्री राम जी खुद डूब जाते थे ऐसे क्यों सर?
अध्यापक :- हरामखोर पाखंडी बन्द कर अपनी बकवास और मुर्गा बन जा
पप्पू :-ठीक है सर, सदियों से हम मूर्ख बनते आ रहे हैं.....
चलो आज मुर्गा बन जाते हैं!!!!!

तर्क

RKrishnan Sharma
😀😀होशियार बच्चा और रामायण की कहानी, अवश्य पढ़ें। 😀😀
अध्यापक :-बच्चों रामचंद्र जी ने समुद्र पर पुल बनाने का निर्णय लिया
पप्पू :- सर मैं कुछ कहना चाहता हूँ।
अध्यापक :- कहो बेटा
पप्पू :- रामचंद्र जी का पुल बनाने का निर्णय गलत था।
अध्यापक :- वो कैसे।
पप्पू :- सर, उनके पास हनुमान थे
जो उडकर लंका जा सकते थे।
तो उनको पुल बनाने की कोई जरूरत नहीं थी
अध्यापक :- हनुमान ही तो उड़ना जानते थे बाकी रीछ और वानर तो नहीं उडते थे।
पप्पू :- सर वो हनुमान की पीठ पर बैठ कर जा सकते थे।
जब हनुमान पुरा पहाड़ उठाकर ले जा सकते थे।
तो.....
अध्यापक :- भगवान की लीला पर सवाल नहीं उठाया करते नालायक
पप्पू :- वैसे सर एक उपाय और था।
अध्यापक :- (गुस्से में ).....क्या ?
पप्पू :- सर, हनुमान अपने आकार को कितना भी छोटा बड़ा कर सकते थे
जैसे सुरसा के मुंह से निकलने के लिए छोटे हो गये थे और सूर्य को मुंह में लेते समय सूर्य से भी बडे..........
तो वो अपने आकार को भी तो समुद्र की चौडाई से बड़ा कर सकते थे और समुद्र के ऊपर लेट जाते।
और सारे बन्दर 🙊 हनुमान जी की पीठ से गुजरकर लंका पहुंच जाते और रामचंद्र को भी समुद्र की अनुनय विनय करने की जरूरत नहीं पड़ती।
वैसे सर एक बात और पूछूँ?
अध्यापक :- पूछो।
पप्पू :- सर सुना है।
समुन्द्र पर पुल बनाते समय वानरों ने पत्थर पर "राम" नाम लिखा था.....
जिससे वो पत्थर पानी 💧 में तैरने लगे।
अध्यापक :- हाँ तो ये सही है।
पप्पू :- सर, सवाल ये है बन्दर भालूओ को पढना लिखना किसने सिखाया था?
और श्री राम लिखे पत्थर तैर जाते थे लेकिन श्री राम जी खुद डूब जाते थे ऐसे क्यों सर?
अध्यापक :- हरामखोर पाखंडी बन्द कर अपनी बकवास और मुर्गा बन जा
पप्पू :-ठीक है सर, सदियों से हम मूर्ख बनते आ रहे हैं.....
चलो आज मुर्गा बन जाते हैं!!!!!

उलट पुलट

उलट पुलट हर तरह के  विचार  पढ़कर सोच विचार करना चाहिए । वरना लकीर के फकीर बन जाओगे ।

God?

Ajay Kumar _
मान लीजिये कि God होता है
लेकिन समस्या ये है कि दुनिया में हज़ारों किस्म के छोटे-बड़े God हैं, किसको असली God माना जाये ?
कोई भी God अपनी शक्ल नहीं दिखाता, अपना पता-ठिकाना नहीं बताता तो किसको असली माना जाये ?

कुछ लोगों ने God के रिश्तेदार होने का दावा किया है,
ैलेकिन दिक़्क़त ये है कि किस रिश्तेदार पे विश्वास किया जाये, और क्यों विश्वास किया जाये ?
कभी God ने तो कहा नहीं कि वो मेरा रिश्तेदार या ख़ास बंदा है..
कुछ अध्यात्मक इन्सान हुए, जो आज के धार्मिक लोगों की तरह जीवनभर किसी God का गुणगान करते रहे, उन्होंने रिश्तेदार होने का दावा नहीं किया,
लेकिन भक्तों ने उनको भी God का रिश्तेदार मान लिया,
या उनको ही God मान लिया.

सदियों पहले कुछ लोगों ने कहानियां लिखी, उन कहानियों के कुछ पात्रों को God मान लिया गया,
सदियों पहले कुछ समझदार इन्सानों ने जीवन उपयोगी चीज़ों और कुदरती शक्तियों के प्रतीक बनाये, करोड़ों लोगों ने उन प्रतीकों को God मान लिया..
पिछली सदियों में अलग-अलग तरीक़े से हज़ारों God बनाये गये.. आज भी हज़ारों किस्म के God बनते हैं.

एक बंदे ने धार्मिक पहनावा पहनकर जादू के चार ट्रिक दिखाये तो करोड़ों लोगों ने उसको God मान लिया,
एक फ़क़ीर मांगकर खाता था,
वो मर गया तो करोड़ों लोगों ने उसको God मान लिया..

लोग तो मानसिक विकलांगों को भी God बना देते हैं, कोई शातिर बनना चाहे तो क्या मुश्किल है ?
इस वक़्त देशभर में जीते-जागते हज़ारों God हैं, जिनको करोड़ों लोग मानते हैं.
रोज़ नये-नये God सामने आते हैं , और आते रहेंगे..

अब हज़ारों किस्म के God हैं, किस God को असली माना जाये ?.. मानने की ज़रूरत भी क्या है ?
किसी झूठ में आस्था रखने वाले को अगर आस्तिक कहते हैं, तो मुझे गर्व है कि मैं सच में आस्था रखने वाला नास्तिक हूँ..

हर आस्तिक को ये पता होना चाहिये, ,कि दूसरे धर्मों के लोग उसको भी नास्तिक मानते हैं..
हर आस्तिक पांच-छह सौ करोड़ लोगों की नज़र में नास्तिक होता है...