हम सभी किसी तरह के प्रचार के शिकार है। अगर हिन्दू घर में पैदा हुए हैं, तो एक तरह के प्रपोगेंडिस्ट हवा में हमको बनया गया है। जैन घर में पैदा हुए, दूसरी तरह की; ईसाई घर में तीसरी तरह की ….रूस में पैदा हो जाए तो एक चोथे तरह की हवा में आपका निर्माण होगा। और आप यही समझेंगे कि, यह जो प्रचार ने आपको सिखा दिया, यह आपका है। जब तक आप यह समझते रहेगें कि प्रचार जो सिखाता है वह आपका है, तब तक आप शास्त्रों से मुक्त नही हो सकते। और जो आदमी प्रपोगेण्डा और प्रचार से मुक्त नही होता, वह कभी सत्य को उपलब्ध नही हो सकता है।
और प्रचार के सूत्र एक जैसे हैं- चाहे लक्स टायलेट साबुन बेचनी हो, चाहे कुरान दोनेा में कोई फर्क नहीं है। advertisement का रास्ता एक ही है, प्रपोंगेडा का रास्ता और सूत्र एक ही है। धर्मगुरु बहुत चालाक लोग थे, उन्हे ये सूत्र पहले पता चल गए, व्यापारियों को बहुत बाद में पता चले। रेडियों पर रोज दोहराया जाता हैं कि सुन्दर चेहरा बनाना हो तो फला-फला अभिनेत्री लक्स टायलेट का उपयोग करती है। अभिनेत्री के चेहरे में और लक्स टायलेट में एक संबंध जोडने की कोशिश की जाती है।
अगर सत्य को पाना हो, तो फंला-फंला .ऋषि रामायण को पढकर सत्य पा गए। ऋषि में और रामायण मे सत्य जोडने की कोशिश की जाती है। यह वही कोशिश हैं, जो अभिनेत्री और लक्स टॉयलेट में की जाती है, अगर सुन्दर होना हो तो लक्स टॉयलेट खरीद लीजिये, और अगर सत्य पाना हो तो फलां-फलां ऋषि ने फलां-फलां किताब से पाया, आप भी उस किताब को खरीद लीजिये! उसके भक्त हो जाइये ! फिर रोज-रोज दोहराने से आदमी का चित्त इतना कमजोर है की रिपीरटिशन को वह भूल जाता है की यह क्या हो रहा है रोज रोज दोहराया जाता है |
आपको पता भी नहीं है, रास्ते पर निकलते है लक्स टॉयलेट सबसे अच्छा साबुन है, दरवाजे पर लिखा हुआ है, अख़बार खोलते हैं, लक्स टॉयलेट सबसे अच्छा साबुन है, रेडियो चलाते है, लक्स टॉयलेट सबसे अच्छा साबुन हैं, रोज.रोज सुनते है |
जब एक दिन आप बाजार में जाते है दुकान पर साबुन खरीदने को आप कहते हैं मुझे लक्स टॉयलेट साबुन चाहिए, और आपको पता नहीं की यह आप नहीं कह रहे हैं, आप से कहलवाया जा रहा है, आपको लक्स टॉयलेट का पता भी नहीं था |
एक प्रपोगैंडा आपके चारों तरफ हो रहा है और आपके मूह से, आपके कान में आवाज़ डाली जा रही है बार-बार जो की एक दिन आपके मूह से निकलनी शुरू हो जाएगी, और आप इस भ्रम में होंगे की मैंने लक्स टॉयलेट साबुन ख़रीदा, आपसे खरीदवा लिया गया और जो लक्स टॉयलेट के सबंध में सही है, वही कुरान, बाइबिल, वेद, उपनिषद् के सम्बन्ध में भी सही है, हम अदभुत रूप से प्रचार के शिकार हैं |
सत्य को जानने की कोशिश करनी चाहिए. सत्य जानने के लिए उलट पुलट हर तरह के विचार पढ़ कर सोचना चाहिए. किसी लोखी गई या कही गई बात को आँख बंद कर नहीं मानना चाहिए. सत्य ही सुन्दर है. सत्य ही कल्याणकरी है.
मंगलवार, 11 जुलाई 2017
प्रचार प्रसार के शिकार हैं हम
तर्क वितर्क
तर्क वितर्क से सत्य उद्घाटित होता है| श्रद्धा भक्ति से नहीं|
अदालतों में दोनों पक्षों तो मौका दिया जाता है|
सोमवार, 10 जुलाई 2017
मांसाहार का औचित्य
हमारे देश मांसाहार अपनाने वाले अधिकांश लोग कुछ दिन विशेष (जैसे सोमवार, मंगलवार, बृहस्पतिवार आदि) कुछ तिथि विशेष (जैसे एकादशी आदि), कुछ माह विशेष (जैसे श्रावण, कार्तिक, बैशाख, पितृ-पक्ष आदि) तथा कुछ पर्व विशेष (जैसे राम नवमी तथा जन्माष्टमी और दीपावली आदि) पर मांसाहारी भोजन का प्रयोग नहीं करते ।
इसका क्या कारण है ।
क्या मांसाहारी भोजन करना हमारी धार्मिक भावनाओं के विरुद्ध है ?
और यदि हमारी धार्मिक भावनाओं के विरुद्ध है तो वर्ष भर के अन्य दिनों में यह कैसे जायज है ?
कचरा
बचपन से ही मस्तिष्क में भरे गए कचरे की सफाई करने से लोग नास्तिक बन जाते हैं| इससे आस्था धर्म के दुकानदारों का नुकसान होता है|
यह बात भगत सिंह बहुत कम उम्र में समझ गए थे|
कोई आस्तिक पैदा नहीं होता
अल्लाह ईश्वर के बारे में बचपन से पढ़ाया सिखाया रटाया जाता है| कोई बच्चा आस्तिक होकर पैदा नहीं होता |
रविवार, 9 जुलाई 2017
भरोसा
आस्तिक जो भगवान पर पूरा भरोसा करते हैं वे ऐसा नहीं करते|
***"
facebook
S.l. Patel _
बैंक वाले..
पेन बांधकर रखते हैं
मेडिकल स्टोर वाले..
कैंची बांधकर रखते है
झेरॉक्स वाले..
स्टेपलर बांधकर रखते है
प्याऊ वाले..
ग्लास बांधकर रखते हैं
कचहरी में वकील ....
कुर्सियां बांध कर रखते ह
बड़े बड़े घर वाले..
कुत्ता बांधकर रखते हैं
लड़कियाँ..
मुंह बांधकर रखती हैं।
और..
पत्नियां...
पति को बांधकर रखती है !!
किसी को किसी पर..
भरोसा ही नहीं ??
! कैसा घोर कलयुग आ गया रे बाबा
ईश्वर क्या है? कौन है?
ईश्वर क्या है?
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इस विषय पर कई मित्रों के बीच गरमा गरम बहस चल रही है । इसे कुछ मित्र गण अपराध की श्रेणी में लेकर ऊट पटांग बाते करते हैँ , जो मेरी राय से उचित नही है । मैंने तो अपने अल्प अध्ययन एवं चिन्तन मनन से यही जाना है कि हिन्दू धर्म , विश्व के अन्य धर्मो से उदार और सुसंस्कृत इसी लिए रहा है , क्योंकि हमारे यहां सदैव धर्म पर , ईश्वर पर , करणीय और अकरणीय पर तर्क करने की स्वतन्त्रता ही नही रही , बल्कि दो चिन्तकों के बीच आमने सामने बहस भी होती थी , और इसी को "शास्त्रार्थ " कहा जाता था ।
इतिहास गवाह है कि ईसामसीह और सुकरात ने ईसाई धर्म की या ओल्ड टेस्टामेन्ट ( ईशाई धर्म शास्त्र ) की इतनी आलोचना नही की , जितनी हमारे यहां बुद्ध और महावीर ने वैदिक धर्म ग्रन्थों की किया था । अब सोचिए कि बुद्ध महावीर पश्चिम में होते तो , क्या बच पाते ?
हमारे यहां आडम्बर , कर्मकाण्ड और कट्टरता की शुरुआत पौराणिक युग से हुई और तभी से तत्कलिक ज्ञान विज्ञान के आधार पर जनहित में बनाए गए नियमों , जो धर्म के नाम से जाने जाते थे ,में कट्टरता का समावेश हुआ ।
कालान्तर में पश्चिम के कुछ वैज्ञानिकों जैसे गैलीलियो , कापरनिक्स आदि ने अपनी शोध से सिद्ध किया कि धर्मशास्त्रों में लिखी सारी बातें सत्य नही हैं । यद्यपि कि इनका शोध (आविष्कार ) सत्य था , परन्तु धर्म सम्मति न होने के कारण पोप पादरियों ने इन वैज्ञानिकों को कठोर यातना और दण्ड तो दिए , लेकिन बाद में इनकी शोधों से सबक लेकर अन्धानुकरण बन्द कर उत्तर आधुनिक काल की ओर अग्रसर हुए ।
हमारा यह दुर्भाग्य रहा है कि हमें इतिहास से , जो सबक लेना चाहिए था वह आज तक नही लिया जिसके कारण पूर्व में हम हजारों वर्ष गुलाम तो रहे ही ,और आज भी उत्तर आधुनिक काल की दौड़ में पीछे हो गए हैँ । शास्त्रों की , कथित धर्माचारियों की सैकडों बातें असत्य सिद्ध होने के बाद भी , उनका अन्धानुकरण तथा "लकीर का फकीर " बने रहना हमारे पिछड़ने का मुख्य कारण आज भी बना हुआ है ।
सम्पूर्ण अस्तित्व एक जीवन्त देह की भांति काम करता है ।प्रत्येक चीज अन्य हर चीज से सम्बंधित है । अस्तित्व स्वशासित है , और जो हो रहा है ,स्वत:स्फूर्त है । यह लोगों को समझ से परे लगा कि इतना बड़ा ब्रह्माण्ड बिना किसी स्रष्टा के कैसे अस्तित्व में आया , और विना किसी नियन्ता के , चल कैसे रहा है ? जब चिन्तन मनन करके चूर हो गए और अपनी कल्पना तथा तर्क शक्ति से इस रहस्य को जानने में नाकामयाब रहे , तो आत्म सन्तोष के लिए जिस शब्द का इस्तेमाल किया , उसी का नाम है " ईश्वर " ।
आदि काल में बहुत सी चीजों के विषय में न जान पाने के कारण ही हमने देवी , देवता , जादू , टोना , जन्तर मन्तर आदि की अवधारणा की थी।जहां जहां से ज्यों ज्यों रहस्य की परतें हटती जा रही हैं , वहां वहां हमारी पूर्व नियोजित अवधारणाएं भी समाप्त होती जा रही हैँ । कहने का तात्पर्य यह कि , किसी चीज को अन्तिम सत्य या अन्तिम खोज मान लेना ही प्रगति की सबसे बडी़ बाधा है । इस पर चर्चा शुरू रहनी चाहिए , बहस भी तार्किक ढंग होती रहनी चाहिए , क्योंकि " डिसकसन इज दि वेस्ट वे , फार नोइंग टु व्हाटिज राइट एन्ड व्हाटिज रांग "
शनिवार, 8 जुलाई 2017
जाति भेद
संदीप कुमार_ जाति भेद
एक दिन पंडित को प्यास लगी, संयोगवश घर में पानी नही था इसलिए उसकी पत्नी पडोस से पानी ले आई I पानी पीकर पंडित ने पूछा....
पंडित - कहाँ से लायी हो बहुत ठंडा पानी है I
पत्नी - पडोस के कुम्हार के घर से I (पंडित ने यह सुनकर लोटा फैंक दिया और उसके तेवर चढ़ गए वह जोर जोर से चीखने लगा )
पंडित - अरी तूने तो मेरा धर्म भ्रष्ट कर दिया, कुंभार ( शुद्र ) के घर का पानी पिला दिया। पत्नी भय से थर-थर कांपने लगी, उसने पण्डित से माफ़ी मांग ली I
पत्नी - अब ऐसी भूल नही होगी। शाम को पण्डित जब खाना खाने बैठा तो घरमे खानेके लिए
कुछ नहीं था.
पंडित - रोटी नहीं बनाई. भाजी
नहीं बनाई.
पत्नी - बनायी तो थी लेकिन अनाज पैदा करनेवाला कुणबी(शुद्र) था.
और जिस कढ़ाई में बनाया था वो लोहार (शुद्र) के घर से आई थी। सब फेक दिया.
पण्डित - तू पगली है क्या कही अनाज और कढ़ाई में भी छुत होती है? यह कह कर पण्डित बोला की पानी तो ले आओ I
पत्नी - पानी तो नही है जीI
पण्डित - घड़े कहाँ गए हैI
पत्नी - वो तो मेने फैंक दिए क्योंकि कुम्हार के हाथ से बने थेI पंडित बोला दूध ही ले आओ वही पीलूँगा I
पत्नी - दूध भी फैंक दिया जी क्योंकि गाय को जिस नौकर ने दुहा था वो तो नीची (शुद्र) जाति से था न I
पंडित- हद कर दी तूने तो यह भी नही जानती की दूध में छूत नही लगती है I
पत्नी-यह कैसी छूत है जी जो पानी में तो लगती है, परन्तु दूध में नही लगती। पंडित के मन में आया कि दीवार से सर फोड़ ले। गुर्रा कर बोला - तूने मुझे चौपट कर दिया है जा अब आंगन में खाट डाल दे मुझे अब नींद आ रही है I
पत्नी- खाट! उसे तो मैने तोड़ कर फैंक दिया है क्योंकि उसे शुद्र (सुतार ) जात वाले ने बनाया था.
पंडित चीखा - ओ फुलो का हार लाओ भगवन को चढ़ाऊंगा ताकि तेरी अक्ल ठिकाने आये.
पत्नी- फेक दिया उसे माली(शुद्र)
जाती ने बनाया था.
पंडित चीखा- सब में आग लगा दो, घर में कुछ बचा भी हैं या नहीं.
पत्नी - हाँ यह घर बचा है, इसे अभी तोडना बाकी है क्योंकि इसे भी तो पिछड़ी जाति के मजदूरों ने बनाया है I पंडित के पास कोई जबाब नही था .उसकी अक्ल तो ठिकाने आयी
बाकी लोगोकी भी आ जायेगी सिर्फ
इस कहानी आगे फॉरवर्ड करो हो सके देश मे जाती वाद खत्म हो जाये
हमारा अंधविश्वास
कई भक्तों को isreal नक्शे में कहां आया ये भी नहीँ मालूम वो आजकल उसके बारे में ज्ञान बाँट रहे है ।
लेकिन वो इस्राएल की मज़बूती के मुख्य कारण जानते नहीँ । उसने हर क्षेत्र में सिर्फ विज्ञान का सहारा लिया है ,हमारी तरह धर्म का नहीँ । किसी भी समस्या के समाधान के लिये हम धर्म स्थान की तरफ़ दौडे और वो प्रयोगशाला की और ।वहां देवताकी मूर्ति को दुध पिलाने के लिये लॉग दौड़ते नहीँ ।सबसे पहेला anti virus उसने बनाया ...नीम्बू -मिर्च लटकाये नहीँ । आज भी हमारी पढ़ी लिखी (!)औरतें शीतला माता -smallpox देवी की पूजा करती है !
सुरक्षा के लिये हमारे यहां नज़र सुरक्षा कवच है ...परमाणु बम प्रतिरोध के लिये गोबर है ...बैठे बैठे पैसे कमाने के लिये धन वर्षा यंत्र है ....
वहां युवा लड़के -लड़कियों के लिये सेना ट्रैनिंग Compulsory है और हमारा ये युवा धन 2महीने रोज़ के 4-5 घंटे गरबा -डांडिया में लगाते है और कथा ,होम हवन ,सत्संग में भी व्यतीत करते है ।
125 करोड़ की जनसँख्या वाले ...विश्व गुरु ,महासत्ता को 80लाख की बस्ती वाले देश के आगे हथियार और सुरक्षा के लिये मदद मांगनी पड़ती है ।
शुक्रवार, 7 जुलाई 2017
रोक
सौ की सीधी....
किसी भी धर्म जाति की ... १.महापंचायतों पर रोक
लगनी चाहिये
२.धर्म स्थलों पर लाउडस्पीकर पर
रोक लगनी चाहिये
३.सार्वजनिक मार्गों से गुजरने
वाले धार्मिक जुलूसों पर रोक होनी चाहिये
४.सार्वजनिक स्थलों पर
मूर्ति स्थापना पर रोक
लगनी चाहिये
५.सार्वजनिक स्थलों पर
अतिक्रमण कर बनाए गए तमाम स्थायी मंदिर , मस्जिद , मजारें ,
देवी या देव स्थान को तत्काल
हटा देना चाहिये ...
६.कुम्भ मेला हो , हज हो या और ऐसे
ही अन्य परलोक सुधार
कार्यक्रमों पर सार्वजनिक धन के उपयोग के बजाय , तमाम मंदिरों ,
मस्जिदों , गिरजाघरों ,
गुरुद्वारों की आय से अनिवार्य
योगदान लिया जाए और से
इकठ्ठा धन इस्तेमाल
किया जाना चाहिये........ ७. धार्मिक उद्देश्यों से किये गए
अंशदान पर किसी भी टैक्स से
उन्मुक्ति न हो pankaj mishra
आजादी
😊
😊
घर चाहे कैसा भी हो..
उसके एक कोने में..
खुलकर हंसने की जगह रखना..
सूरज कितना भी दूर हो..
उसको घर आने का रास्ता देना..
कभी कभी छत पर चढ़कर..
तारे अवश्य गिनना..
हो सके तो हाथ बढ़ा कर..
चाँद को छूने की कोशिश करना .
अगर हो लोगों से मिलना जुलना..
तो घर के पास पड़ोस ज़रूर रखना..
भीगने देना बारिश में..
उछल कूद भी करने देना..
हो सके तो बच्चों को..
एक कागज़ की किश्ती चलाने देना..
कभी हो फुरसत,आसमान भी साफ हो..
तो एक पतंग आसमान में चढ़ाना..
हो सके तो एक छोटा सा पेंच भी लड़ाना..
घर के सामने रखना एक पेड़..
उस पर बैठे पक्षियों की बातें अवश्य सुनना..
घर चाहे कैसा भी हो..
घर के एक कोने में..
खुलकर हँसने की जगह रखना.
महापुरुषों की नजर से धर्म
महापुरुषों की नज़र से – धर्म
कुछ विश्वप्रसिद्ध लोगो के धर्म /मजहब के बारे में विचार:
1 – आचार्य चार्वाक (वेदकाल)
” ईश्वर एक रुग्ण विचार प्रणाली है, इससे मानवता का कोई कल्याण होने वाला नहीं है।”
2 – अजित केशकम्बल ( 523 ई . पू )
अजित केश्कंबल बुद्ध के समय कालीन विख्यात तीर्थंकर थे , त्रिपितिका में अजित के विचार कई जगह आये हैं , उनका कहना था –
” दान , यज्ञ , हवन नहीं ….लोक परलोक नहीं”
3 – सुकरात ( 466-366 ई पू )
” ईश्वर केवल शोषण का नाम है ”
4 – इब्न रोश्द ( 1126-1198 )
इनका जन्म स्पेन के मुस्लिम परिवार में हुआ था, रोश्द के दादा जामा मस्जिद के इमाम थे, इन्हें कुरआन कंठस्थ थी। इन्होने अल्लाह के अस्तित्व को नकार दिया था और इस्लाम को राजनैतिक गिरोह कहा था। जिस कारण मुस्लिम धर्मगुरु इनकी जान के पीछे पड़ गए थे।रोश्द ने दर्शन के बुद्धि प्रधान हथियार से इस्लाम के मजहबी वादशास्त्रियों की खूब खबर ली ।
5 – कोपरनिकस ( 1473-1543)
इन्होने धर्म गुरुओं की पोल खोल थी इसमें धर्मगुरु ये कह कर लोगों को मुर्ख बना रहे थे कि सूर्य पृथ्वी के चक्कर लगाता है। कॉपरनिकस ने अपने प्रयोग से ये सिद्ध कर दिया कि पृथ्वी सहित सौर मंडल के सभी ग्रह सूर्य के चक्कर लगाते हैं, जिस कारण धर्म गुरु इतने नाराज हुए की कोपरनिकस के सभी सार्थक वैज्ञानिको को कठोर दंड देना प्रारंभ कर दिया।
6 – मार्टिन लूथर ( 1483-1546)
इन्होने जर्मनी में अन्धविश्वास, पाखंड और धर्गुरुओं के अत्याचारों के खिलाफ आन्दोलन किया इन्होने कहा था “व्रत, तीर्थयात्रा, जप, दान अदि सब निरर्थक है”
7 -सर फ्रेंसिस बेकन ( 1561-1626)
अंग्रेजी के सारगर्भित निबंधो के लिए प्रसिद्ध, तेइस साल की उम्र में ही पार्लियामेंट के सदस्य बने, बाद में लार्ड चांसलर भी बने। उनका कहना था
“नास्तिकता व्यक्ति को विचार-दर्शन, स्वभाविक निष्ठा, नियम पालन की और ले जाती है, ये सभी चीजे सतही नैतिक गुणों की पथ दर्शिका हो सकती हैं।
8 – बेंजामिन फ्रेंकलिन (1706-1790)
इनका कहना था “सांसारिक प्रपंचो में मनुष्य धर्म से नहीं बल्कि इनके न होने से सुरक्षित है”
9- चार्ल्स डार्विन (1809-1882)
इन्होने ईश्वरवाद और धार्मिक गुटों पर सर्वधिक चोट पहुचाई, इनका कहना था “मैं किसी ईश्वरवाद में विश्वास नहीं रखता और न ही आगमी जीवन के बारे में”
10-कार्ल मार्क्स ( 1818-1883)
कार्ल मार्क्स का कहना था “ईश्वर का जन्म एक गहरी साजिश से हुआ है और “धर्म” एक अफीम है “उनकी नजर में धर्म विज्ञान विरोधी, प्रगति विरोधी, प्रतिगामी, अनुपयोगी और अनर्थकारी है, इसका त्याग ही जनहित में है।
11- पेरियार (1879-1973)
इनका जन्म तमिलनाडु में हुआ और इन्होने जातिवाद, ईश्वरवाद, पाखंड, अन्धविश्वास पर जम के प्रहार किया।
12- अल्बर्ट आइन्स्टीन ( 1879-1955)
विश्वविख्यात वैज्ञानिक का कहना था “व्यक्ति का नैतिक आचरण मुख्य रूप से सहानभूति, शिक्षा और सामाजिक बंधन पर निर्भर होना चाहिए, इसके लिए धार्मिक आधार की कोई आवश्यकता नहीं है मृत्यु के बाद दंड का भय और पुरस्कार की आशा से नियंत्रित करने पर मनुष्य की हालत दयनीय हो जाती है”
13-भगत सिंह (1907-1931)
प्रमुख स्वतन्त्रता सैनानी भगत सिंह ने अपनी पुस्तक “मैं नास्तिक क्यों हूँ?” में कहा है “मनुष्य ने जब अपनी कमियों और कमजोरियों पर विचार करते हुए अपनी सीमाओं का अहसास किया तो मनुष्य को तमाम कठिनाईयों का साहस पूर्ण सामना करने और तमाम खतरों के साथ वीरतापूर्ण जुझने की प्रेरणा देने वाली तथा सुख दिनों में उच्छखल न हो जाये इसके लिए रोकने और नियंत्रित करने के लिए ईश्वर की कल्पना की गयी है”
14- लेनिन (1870-1924)
लेनिन के अनुसार “जो लोग जीवन भर मेहनत मशक्कत करते है और अभाव में जीते हैं उन्हें धर्म इहलौकिक जीवन में विनम्रता और धैर्य रखने की तथा परलोक में सुख की आशा से सांत्वना प्राप्त करने की शिक्षा देता है, परन्तु जो लोग दुसरो के श्रम पर जीवित रहते हैं उन्हें इहजीवन में दयालुता की शिक्षा देता है, इस प्रकार उन्हें शोषक के रूप में अपने सम्पूर्ण अस्तित्व का औचित्य सिद्ध करने का एक सस्ता नुस्खा बता देता है”
अत: , भले ही धर्म प्राचीन समय के समाज की आवश्यकता रहा हो परन्तु वह एक अन्धविश्वास ही था जो अपने साथ कई अन्धविश्वासो को जोड़ता चला गया. धर्म और अन्धविश्वास दोनों एक दुसरे के पूरक हैं, अंधविश्वासों का जन्म भी उसी तरह हुआ जिस तरह भांति भांति धर्मो का।
.......जगदीश काबरे
मन्नतें और अंधविश्वास
आपने कहते सुना होगा कि, उस बाबा के कृपा से मैं पास हो गया, मेरी नौकरी लग गयी, मेरा बच्चा हो गया, मेरी ये मन्नत पूरी हो गयी, मैं चादर चढाने जा रहा हूँ, और वाकई में ऐसा देखने को भी मिलता है।
पर क्या ये सच में होता है?
क्या बाबा के पास शक्ति होती है?
क्या चादर से मन्नतें पूरी होती है?
जवाब है - नही
होता ये है कि अगर 500 लोग किसी बाबा के पास या किसी मजार पर गये तो 5 लोगों की मन्नत या उनकी ख्वाहिश संयोग से पूरी हो जाती है, जो उनके न जाने पर भी पूरी हो जाती।
और यहीं से इस अन्धविश्वास की शुरुवात होती है, जिन 495 लोगों की मन्नत पूरी नहीं होती, वो ये सोचकर खामोश हो जाते हैं कि मेरे में गलती रही होगी, या बाबा इस बार मेरी नहीं सुने हैं, इसतरह वो किसी से नही कहते है, खामोश रहते हैं।
पर जिन 5 लोगों का संयोग से मन्नतें पूरी हो जाती है, वो 500 लोगों को बता देते हैं और फिर वो 500 लोग 50,000 को ऐसे संख्या बढ़ती जाती है, और लोग बाबा के पास या माजर पर जाते रहते हैं।
**इस अन्धविश्वास से बचे, खुद पे विश्वास रखे , आपको मेरा यकीन न हो तो मुझे किसी बाबा या ऐसे मजार पर बुलाएँ मैं आपके सामने मन्नत मांगता हूँ, कि कहीं बलात्कार/चोरी/जुर्म न हो, और पूरी सिद्दत से, पुरे मन से देखतें है पूरा होता है की नही।।।
नोट- मंदिर/मस्जिद/गुरुद्वारा/चर्च आदि की मन्नत को भी इसी रूप में लो
सोमवार, 3 जुलाई 2017
अपना धर्म सर्वश्रेष्ठ
दुनिया में सबसे मासूम वो लोग हैं जो किसी एक धर्म को सर्वश्रेष्ठ बताते हैं.. और इत्तफाकन वो वही धर्म होता है जिसे मानने वालों के बीच उसका जन्म और लालन-पालन हुआ
अब मासूमो को कौन बताये की अपना धर्म ही बेस्ट है थ्योरी से चले तो दुनिया में 4200 धर्म है और आपका धर्म 4199 धर्म के लोगो की नज़र में कमतर है ...!!!
बुधवार, 28 जून 2017
देशभक्ति और धार्मिकता
भारत माता की जय बोल कर सच्चा देशभक्त और जय श्री राम बोल के सच्चा हिन्दू बनने से आसान दुनियाँ में कुछ नही है । मैं और आप कई ऐसे लोगों को जानते होंगे जो अगर किसी सरकारी पद पर हैं और बेहद घूसखोर हैं या 2 नम्बर का बिजनेस करते हैं और भारत माता की जय बोल खुद बहुत बड़े देहभक्त बने हुए हैं । या ऐसे लोगों को भी जानते होंगे जो आज तक एक भी धार्मिक पुस्तक न पढ़े हैं न धर्म के रस्ते चलते हैं ऊपर से कोई भी शाम उनकी बिना मुर्गे और दारु की गुजरती नही और जय श्री राम कह के सच्चे हिन्दू बने बैठे हैं । ऐसे लोग दूसरों को भी सर्टिफिकेट बाँटते फिरते हैं ।
देशभक्ति और आध्यात्मिक होना इतना आसान नही है ... इसे अपने जीवन मे जीना होता है ... प्यारी से प्यारी चीज की कुर्बानी चुपचाप देनी पड़ती है ।
मंगलवार, 27 जून 2017
Meditation
ध्यान Meditation से अंतर्मन को देखकर संशोधन परिवर्तन संभव है| अपने धर्म को पढ़कर समझ कर विचार विमर्श कर संशोधन परिवर्तन संभव है|
अपनी बुराई देखें
दूसरे की बुराई देखने की अपेक्षा अपनी बुराई देखना और दूसरे धर्म की बुराई देखने की अपेक्षा अपने धर्म की बुराई देखना समाज के हित में है|
सोमवार, 26 जून 2017
ईश्वर का नाम जपना
क्या ईश्वर का नाम लेने मात्र से पाप से मुक्ति मिल सकती है?
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किसी ईश्वर के नाम के स्मरण से मनुष्य पाप कर्म के फल से उसी तरह मुक्त नहीं हो सकता जिस तरह मिसरी- मिसरी कहने से मुँह मीठा और नीम नींम कहने से मुँह कड़वा नहीं होता।
सभी धर्मों में संशोधन परिवर्तन
सभी धर्मों के नियम कायदे अलग अलग हैं परस्पर विरोधी भी हैं| देश काल परिस्थिति अनुसार अलग अलग धर्मों की स्थापना हुई| लेकिन धर्मों के ठेकेदार उनमें कोई संशोधन परिवर्तन नहीं चाहते| यह उचित नहीं है|
......
जब धर्म बने थ तब लोग आज की अपेक्षा कम intelligent थे इसलिए उनके के कथा कहानी, नियम कायदे में संशोधन परिवर्तन होना चाहिए|
.......
रविवार, 25 जून 2017
किस की सुनेंगे भगवान?
मंदिरों में पहुंचने वाले ९९% याचक ही होते हैं | एक पद के लिए प्रतिस्पर्धा में शामिल किस भक्त की भगवान सुने ? अदालत में मुकदमा लड़ रहे दोनों पक्षों में से किसकी सुनेगा ?
योग
कहा जाता है योग करने से आत्मा और परमात्मा का योग होता है अर्थात दोनो जुड़ जाते हैं| योगासन करने से आत्मा परमात्मा एक हो जाते हैं|
यह भी कहा जाता है कि योग करने से व्यक्ति निरोग रहेगा|
हमारे देश में ऋषि मुनि भी योग करते थे| आम जन भी करते हैं|
कहां तक सही है पता नहीं|
धर्म और इंसानियत
Avdhesh Nigam
बच्चे नहीं जानते मज़हब का मतलब
यही तो है उनके चेहरों पर रोशनी का सबब
तुम मज़हब का मतलब
उन्हें क्योंकर समझाते हो ?
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बच्चों को मन्दिर या मस्जिद का रास्ता न दिखाया जाये,क्यों न उन्हें इन्सान बनाया जाए.
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