शनिवार, 8 जुलाई 2017

हमारा अंधविश्वास

Dr Vijay Mehta

कई भक्तों को isreal नक्शे में कहां आया ये भी नहीँ मालूम वो आजकल उसके बारे में ज्ञान बाँट रहे है । 
लेकिन वो इस्राएल की मज़बूती के मुख्य कारण जानते नहीँ । उसने हर क्षेत्र में सिर्फ विज्ञान का सहारा लिया है ,हमारी तरह धर्म का नहीँ । किसी भी समस्या के समाधान के लिये हम धर्म स्थान की तरफ़ दौडे और वो प्रयोगशाला की और ।वहां देवताकी मूर्ति को दुध पिलाने के लिये लॉग दौड़ते नहीँ ।सबसे पहेला anti virus उसने बनाया ...नीम्बू -मिर्च लटकाये नहीँ । आज भी हमारी पढ़ी लिखी (!)औरतें शीतला माता -smallpox देवी की पूजा करती है !
सुरक्षा के लिये हमारे यहां नज़र सुरक्षा कवच है ...परमाणु बम प्रतिरोध के लिये गोबर है ...बैठे बैठे पैसे कमाने के लिये धन वर्षा यंत्र है ....
वहां युवा लड़के -लड़कियों के लिये सेना ट्रैनिंग Compulsory है और हमारा ये युवा धन 2महीने रोज़ के 4-5 घंटे गरबा -डांडिया में लगाते है और कथा ,होम हवन ,सत्संग में भी व्यतीत करते है ।

125 करोड़ की जनसँख्या वाले ...विश्व गुरु ,महासत्ता को 80लाख की बस्ती वाले देश के आगे हथियार और सुरक्षा के लिये मदद मांगनी पड़ती है ।

शुक्रवार, 7 जुलाई 2017

रोक

Nikhilesh Mishra

सौ की सीधी....
किसी भी धर्म जाति की ... १.महापंचायतों पर रोक
लगनी चाहिये
२.धर्म स्थलों पर लाउडस्पीकर पर
रोक लगनी चाहिये
३.सार्वजनिक मार्गों से गुजरने
वाले धार्मिक जुलूसों पर रोक होनी चाहिये
४.सार्वजनिक स्थलों पर
मूर्ति स्थापना पर रोक
लगनी चाहिये
५.सार्वजनिक स्थलों पर
अतिक्रमण कर बनाए गए तमाम स्थायी मंदिर , मस्जिद , मजारें ,
देवी या देव स्थान को तत्काल
हटा देना चाहिये ...
६.कुम्भ मेला हो , हज हो या और ऐसे
ही अन्य परलोक सुधार
कार्यक्रमों पर सार्वजनिक धन के उपयोग के बजाय , तमाम मंदिरों ,
मस्जिदों , गिरजाघरों ,
गुरुद्वारों की आय से अनिवार्य
योगदान लिया जाए और से
इकठ्ठा धन इस्तेमाल
किया जाना चाहिये........ ७. धार्मिक उद्देश्यों से किये गए
अंशदान पर किसी भी टैक्स से
उन्मुक्ति न हो pankaj mishra

आजादी

Wisdom

😊😊

घर चाहे कैसा भी हो..
उसके एक कोने में..
खुलकर हंसने की जगह रखना..

सूरज कितना भी दूर हो..
उसको घर आने का रास्ता देना..

कभी कभी छत पर चढ़कर..
तारे अवश्य गिनना..
हो सके तो हाथ बढ़ा कर..
चाँद को छूने की कोशिश करना .

अगर हो लोगों से मिलना जुलना..
तो घर के पास पड़ोस ज़रूर रखना..

भीगने देना बारिश में..
उछल कूद भी करने देना..
हो सके तो बच्चों को..
एक कागज़ की किश्ती चलाने देना..

कभी हो फुरसत,आसमान भी साफ हो..
तो एक पतंग आसमान में चढ़ाना..
हो सके तो एक छोटा सा पेंच भी लड़ाना..

घर के सामने रखना एक पेड़..
उस पर बैठे पक्षियों की बातें अवश्य सुनना..

घर चाहे कैसा भी हो.. 
घर के एक कोने में..
खुलकर हँसने की जगह रखना.

महापुरुषों की नजर से धर्म

Nikhilesh Mishra

महापुरुषों की नज़र से – धर्म
कुछ विश्वप्रसिद्ध लोगो के धर्म /मजहब के बारे में विचार:
1 – आचार्य चार्वाक (वेदकाल)
” ईश्वर एक रुग्ण विचार प्रणाली है, इससे मानवता का कोई कल्याण होने वाला नहीं है।”
2 – अजित केशकम्बल ( 523 ई . पू )
अजित केश्कंबल बुद्ध के समय कालीन विख्यात तीर्थंकर थे , त्रिपितिका में अजित के विचार कई जगह आये हैं , उनका कहना था –
” दान , यज्ञ , हवन नहीं ….लोक परलोक नहीं”
3 – सुकरात ( 466-366 ई पू )
” ईश्वर केवल शोषण का नाम है ”
4 – इब्न रोश्द ( 1126-1198 )
इनका जन्म स्पेन के मुस्लिम परिवार में हुआ था, रोश्द के दादा जामा मस्जिद के इमाम थे, इन्हें कुरआन कंठस्थ थी। इन्होने अल्लाह के अस्तित्व को नकार दिया था और इस्लाम को राजनैतिक गिरोह कहा था। जिस कारण मुस्लिम धर्मगुरु इनकी जान के पीछे पड़ गए थे।रोश्द ने दर्शन के बुद्धि प्रधान हथियार से इस्लाम के मजहबी वादशास्त्रियों की खूब खबर ली ।
5 – कोपरनिकस ( 1473-1543)
इन्होने धर्म गुरुओं की पोल खोल थी इसमें धर्मगुरु ये कह कर लोगों को मुर्ख बना रहे थे कि सूर्य पृथ्वी के चक्कर लगाता है। कॉपरनिकस ने अपने प्रयोग से ये सिद्ध कर दिया कि पृथ्वी सहित सौर मंडल के सभी ग्रह सूर्य के चक्कर लगाते हैं, जिस कारण धर्म गुरु इतने नाराज हुए की कोपरनिकस के सभी सार्थक वैज्ञानिको को कठोर दंड देना प्रारंभ कर दिया।
6 – मार्टिन लूथर ( 1483-1546)
इन्होने जर्मनी में अन्धविश्वास, पाखंड और धर्गुरुओं के अत्याचारों के खिलाफ आन्दोलन किया इन्होने कहा था “व्रत, तीर्थयात्रा, जप, दान अदि सब निरर्थक है”
7 -सर फ्रेंसिस बेकन ( 1561-1626)
अंग्रेजी के सारगर्भित निबंधो के लिए प्रसिद्ध, तेइस साल की उम्र में ही पार्लियामेंट के सदस्य बने, बाद में लार्ड चांसलर भी बने। उनका कहना था
“नास्तिकता व्यक्ति को विचार-दर्शन, स्वभाविक निष्ठा, नियम पालन की और ले जाती है, ये सभी चीजे सतही नैतिक गुणों की पथ दर्शिका हो सकती हैं।
8 – बेंजामिन फ्रेंकलिन (1706-1790)
इनका कहना था “सांसारिक प्रपंचो में मनुष्य धर्म से नहीं बल्कि इनके न होने से सुरक्षित है”
9- चार्ल्स डार्विन (1809-1882)
इन्होने ईश्वरवाद और धार्मिक गुटों पर सर्वधिक चोट पहुचाई, इनका कहना था “मैं किसी ईश्वरवाद में विश्वास नहीं रखता और न ही आगमी जीवन के बारे में”
10-कार्ल मार्क्स ( 1818-1883)
कार्ल मार्क्स का कहना था “ईश्वर का जन्म एक गहरी साजिश से हुआ है और “धर्म” एक अफीम है “उनकी नजर में धर्म विज्ञान विरोधी, प्रगति विरोधी, प्रतिगामी, अनुपयोगी और अनर्थकारी है, इसका त्याग ही जनहित में है।
11- पेरियार (1879-1973)
इनका जन्म तमिलनाडु में हुआ और इन्होने जातिवाद, ईश्वरवाद, पाखंड, अन्धविश्वास पर जम के प्रहार किया।
12- अल्बर्ट आइन्स्टीन ( 1879-1955)
विश्वविख्यात वैज्ञानिक का कहना था “व्यक्ति का नैतिक आचरण मुख्य रूप से सहानभूति, शिक्षा और सामाजिक बंधन पर निर्भर होना चाहिए, इसके लिए धार्मिक आधार की कोई आवश्यकता नहीं है मृत्यु के बाद दंड का भय और पुरस्कार की आशा से नियंत्रित करने पर मनुष्य की हालत दयनीय हो जाती है”
13-भगत सिंह (1907-1931)
प्रमुख स्वतन्त्रता सैनानी भगत सिंह ने अपनी पुस्तक “मैं नास्तिक क्यों हूँ?” में कहा है “मनुष्य ने जब अपनी कमियों और कमजोरियों पर विचार करते हुए अपनी सीमाओं का अहसास किया तो मनुष्य को तमाम कठिनाईयों का साहस पूर्ण सामना करने और तमाम खतरों के साथ वीरतापूर्ण जुझने की प्रेरणा देने वाली तथा सुख दिनों में उच्छखल न हो जाये इसके लिए रोकने और नियंत्रित करने के लिए ईश्वर की कल्पना की गयी है”
14- लेनिन (1870-1924)
लेनिन के अनुसार “जो लोग जीवन भर मेहनत मशक्कत करते है और अभाव में जीते हैं उन्हें धर्म इहलौकिक जीवन में विनम्रता और धैर्य रखने की तथा परलोक में सुख की आशा से सांत्वना प्राप्त करने की शिक्षा देता है, परन्तु जो लोग दुसरो के श्रम पर जीवित रहते हैं उन्हें इहजीवन में दयालुता की शिक्षा देता है, इस प्रकार उन्हें शोषक के रूप में अपने सम्पूर्ण अस्तित्व का औचित्य सिद्ध करने का एक सस्ता नुस्खा बता देता है”
अत: , भले ही धर्म प्राचीन समय के समाज की आवश्यकता रहा हो परन्तु वह एक अन्धविश्वास ही था जो अपने साथ कई अन्धविश्वासो को जोड़ता चला गया. धर्म और अन्धविश्वास दोनों एक दुसरे के पूरक हैं, अंधविश्वासों का जन्म भी उसी तरह हुआ जिस तरह भांति भांति धर्मो का।
.......जगदीश काबरे

मन्नतें और अंधविश्वास

Meraj Anwar

#झाड़_फ़ूक_बाबा_माजर_मन्नत

आपने कहते सुना होगा कि, उस बाबा के कृपा से मैं पास हो गया, मेरी नौकरी लग गयी, मेरा बच्चा हो गया, मेरी ये मन्नत पूरी हो गयी, मैं चादर चढाने जा रहा हूँ, और वाकई में ऐसा देखने को भी मिलता है।

पर क्या ये सच में होता है?
क्या बाबा के पास शक्ति होती है?
क्या चादर से मन्नतें पूरी होती है?

जवाब है - नही

होता ये है कि अगर 500 लोग किसी बाबा के पास या किसी मजार पर गये तो 5 लोगों की मन्नत या उनकी ख्वाहिश संयोग से पूरी हो जाती है, जो उनके न जाने पर भी पूरी हो जाती।

और यहीं से इस अन्धविश्वास की शुरुवात होती है, जिन 495 लोगों की मन्नत पूरी नहीं होती, वो ये सोचकर खामोश हो जाते हैं कि मेरे में गलती रही होगी, या बाबा इस बार मेरी नहीं सुने हैं, इसतरह वो किसी से नही कहते है, खामोश रहते हैं।

पर जिन 5 लोगों का संयोग से मन्नतें पूरी हो जाती है, वो 500 लोगों को बता देते हैं और फिर वो 500 लोग 50,000 को ऐसे संख्या बढ़ती जाती है, और लोग बाबा के पास या माजर पर जाते रहते हैं।

**इस अन्धविश्वास से बचे, खुद पे विश्वास रखे , आपको मेरा यकीन न हो तो मुझे किसी बाबा या ऐसे मजार पर बुलाएँ मैं आपके सामने मन्नत मांगता हूँ, कि कहीं बलात्कार/चोरी/जुर्म न हो, और पूरी सिद्दत से, पुरे मन से देखतें है पूरा होता है की नही।।।

नोट- मंदिर/मस्जिद/गुरुद्वारा/चर्च आदि की मन्नत को भी इसी रूप में लो

सोमवार, 3 जुलाई 2017

संभावित आतंकी

नीतीश के. एस.

हर वो इन्सान जो अपने धर्म के खिलाफ कुछ नहीं सुन सकता, एक संभावित आतंकी होता है.

अपना धर्म सर्वश्रेष्ठ

Raman Sandhu

दुनिया में सबसे मासूम वो लोग हैं जो किसी एक धर्म को सर्वश्रेष्ठ बताते हैं.. और इत्तफाकन वो वही धर्म होता है जिसे मानने वालों के बीच उसका जन्म और लालन-पालन हुआ
अब मासूमो को कौन बताये की अपना धर्म ही बेस्ट है थ्योरी से चले तो दुनिया में 4200 धर्म है और आपका धर्म 4199 धर्म के लोगो की नज़र में कमतर है ...!!!

बुधवार, 28 जून 2017

देशभक्ति और धार्मिकता

Keshav Krantikari

भारत माता की जय बोल कर सच्चा देशभक्त और जय श्री राम बोल के सच्चा हिन्दू बनने से आसान दुनियाँ में कुछ नही है । मैं और आप कई ऐसे लोगों को जानते होंगे जो अगर किसी सरकारी पद पर हैं और बेहद घूसखोर हैं या 2 नम्बर का बिजनेस करते हैं और भारत माता की जय बोल खुद बहुत बड़े देहभक्त बने हुए हैं । या ऐसे लोगों को भी जानते होंगे जो आज तक एक भी धार्मिक पुस्तक न पढ़े हैं न धर्म के रस्ते चलते हैं ऊपर से कोई भी शाम उनकी बिना मुर्गे और दारु की गुजरती नही और जय श्री राम कह के सच्चे हिन्दू बने बैठे हैं । ऐसे लोग दूसरों को भी सर्टिफिकेट बाँटते फिरते हैं ।
देशभक्ति और आध्यात्मिक होना इतना आसान नही है ... इसे अपने जीवन मे जीना होता है ... प्यारी से प्यारी चीज की कुर्बानी चुपचाप देनी पड़ती है ।

मंगलवार, 27 जून 2017

Meditation

ध्यान Meditation से अंतर्मन को देखकर संशोधन परिवर्तन संभव है| अपने धर्म को पढ़कर समझ कर विचार विमर्श कर संशोधन परिवर्तन संभव है|

अपनी बुराई देखें

दूसरे की बुराई देखने की अपेक्षा अपनी बुराई देखना और दूसरे धर्म की बुराई देखने की अपेक्षा अपने धर्म की बुराई देखना समाज के हित में है|

सोमवार, 26 जून 2017

ईश्वर का नाम जपना

Dinesh Aastik

क्या ईश्वर का नाम लेने मात्र से पाप से मुक्ति मिल सकती है?
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किसी ईश्वर के नाम के स्मरण से मनुष्य पाप कर्म के फल से उसी तरह मुक्त नहीं हो सकता जिस तरह मिसरी- मिसरी कहने से मुँह मीठा और नीम नींम कहने से मुँह कड़वा नहीं होता।

सभी धर्मों में संशोधन परिवर्तन

सभी धर्मों के नियम कायदे अलग अलग हैं परस्पर विरोधी भी हैं| देश काल परिस्थिति अनुसार अलग अलग धर्मों की स्थापना हुई| लेकिन धर्मों के ठेकेदार उनमें कोई संशोधन परिवर्तन नहीं चाहते| यह उचित नहीं है|
......

जब धर्म बने थ तब लोग आज की अपेक्षा कम intelligent थे इसलिए उनके के कथा कहानी, नियम कायदे में संशोधन परिवर्तन होना चाहिए|
.......

रविवार, 25 जून 2017

किस की सुनेंगे भगवान?

Suresh Soni

मंदिरों में पहुंचने वाले ९९% याचक ही होते हैं | एक पद के लिए प्रतिस्पर्धा में शामिल किस भक्त की भगवान सुने ? अदालत में मुकदमा लड़ रहे दोनों पक्षों में से किसकी सुनेगा ?

योग

कहा जाता है योग करने से आत्मा और परमात्मा का योग होता है अर्थात दोनो जुड़ जाते हैं| योगासन करने से आत्मा परमात्मा एक हो जाते हैं|
यह भी कहा जाता है कि योग करने से व्यक्ति निरोग रहेगा|
हमारे देश में ऋषि मुनि भी योग करते थे| आम जन भी करते हैं|
कहां तक सही है पता नहीं|

हमारी परंपराएं तर्क की कसौटी पर

Sachin-

धर्म और इंसानियत

Avdhesh Nigam
बच्चे नहीं जानते मज़हब का मतलब
यही तो है उनके चेहरों पर रोशनी का सबब
तुम मज़हब का मतलब
उन्हें क्योंकर समझाते हो ?
****"""
बच्चों को मन्दिर या मस्जिद का रास्ता न दिखाया जाये,क्यों न उन्हें इन्सान बनाया जाए.
   *************

रक्त और धर्म

Satyam Shukla

सूर्य को अर्ध्य

Rattan Lal Gottra > ‎"अंध-भक्त मुक्त भारत" #ABMB

👍👍👉🙏एकबार पंडित लोग गंगा नदी मे खड़े हो कर सूर्य को पानी दे रहे थे। 
👉गुरुनानक जी ने ठीक उनके विपरीत पानी मे खड़े हो कर के पानी फेंकना शुरू कर दिया ।
👉तब पंडितों ने कहा के आप इधर पानी क्यों दे रहे हों? 
👉नानकजी ने सवाल पर सवाल कर दिया के आप लोग उधर पानी क्यों दे रहे हो? 
तब पंडितों ने जवाब दिया कि हम लोग तो सूर्य देवता को पानी दे रहे हैं । 
👉तब नानकजी ने कहा मै भी अपने खेतों को पानी दे रहा हूं जो करतारपुर (पंजाब) मे हैं ।
👉पंडितों ने कहा तूं मूरख लगता है, भला इतनी दूर से खेतों को पानी कैसे पहुंच सकता है?
👉गुरु नानक जी ने कहा जब आपका दिया हुआ पानी लाखों मील दूर सूर्य तक पहुंच सकता है, तो मेरे खेत तो यहां से सिर्फ 250मील ही दूर हैं ।
ये सुन कर पंडित लोग हर बार की तरह शरमिंदा हो गये । 
👉यह है गुरुनानक जी का पाखंड पर चोट करने का एक तरीका था 🙏🙏🙏🙏

सूर्य नमस्कार एक मूरख होने की निशानी है ।
गुरु जी के अनुसार, भारत उन मूरखों से भरा पड़ा है ।

रामसेतु

Veeru Ji

रामसेतु का सच

राम सेतु (Adams bridge) इसको अधिक पुराना होने के कारन आदम पुल भी कहाँ जाता है । राम सेतु (Adams bridge) पर नासा ने रिसर्च कर बताया कि यह पुल प्रकृति निर्मित है, मानव निर्मित नही । यह समुद्र में पाये जाने वाले मूँगा (CORAL) में पाये जाने वाले केल्शियम कार्बोनेट के छोड़े जाने से निर्मित श्रंखला है । जिसकी लंबाई 30Km. है । नासा ने इसके सैम्पल लेकर रेडियो कार्बन परिक्षण से बताया कि यह सेतु 17.5 लाख पुराना है । मूंगा(Coral) समुद्र के कम गहरे पानी में जमा होकर श्रंखला बनाते है । विश्व में मूँगा से निर्मित ऐसी 10 श्रृंखलाएँ है इनमे से सबसे बड़ी ऑस्ट्रेलिया के समुद्र तट पर है । इसकी लंबाई रामसेतु से भी कई गुणा अधिक 2500 Km है । विश्व की इन सभी दश मूँगा श्रंखलाओ को सेटेलाईट के द्वारा देखा जा चूका है ।
नासा के रिसर्च अनुसार राम सेतु जब 17.5 लाख पुराना है, तो इसे राम निर्मित कैसे कहाँ जा सकता है । जबकि मानव ने खेती करना /कपडे पहनना 8000 हजार वर्ष ईसा पूर्व सीखा है । मानव ने लोहा की खोज 1500 ईसा पूर्व की है ।मानव ने लिखना 1300 ईसा पूर्व सीखा है ।

मुझे चाहिए सब कुछ

Vinod Kumar

*-मैं भारत का नागरिक हूँ,*
*_मुझे लड्डू दोनों हाथ चाहिये।*

*-बिजली मैं बचाऊँगा नहीं,*
*_बिल मुझे माफ़ चाहिये ।*

*-पेड़ मैं लगाऊँगा नहीं,*
*_मौसम मुझको साफ़ चाहिये।*

*-शिकायत मैं करूँगा नहीं,*
*_कार्रवाई तुरंत चाहिये ।*

*-बिना लिए कुछ काम न करूँ,*
*_पर भ्रष्टाचार का अंत चाहिये ।*

*-घर-बाहर कूड़ा फेकूं,*
*_शहर मुझे साफ चाहिये ।*

*-काम करूँ न धेले भर का,*
*_वेतन लल्लनटाॅप चाहिये ।*

*-एक नेता कुछ बोल गया सो*
*_मुफ्त में पंद्रह लाख चाहिये।*

*-लाचारों वाले लाभ उठायें,*
*_फिर भी ऊँची साख चाहिये।*

*-लोन मिले बिल्कुल सस्ता,*
*_बचत पर ब्याज बढ़ा चाहिये।*

*-धर्म के नाम रेवडियां खाएँ,* 
*_पर देश धर्मनिरपेक्ष चाहिये।*

*-जाती के नाम पर वोट दे,*
*_अपराध मुक्त राज्य चाहिए।*

*-टैक्स न मैं दूं धेलेभर का,*
*-विकास मे पूरी रफ्तार चाहिए ।*

*-मैं भारत का नागरिक हूँ ,*
*_मुझे लड्डू दोनों हाथ चाहिए।*

मजहब सिखाता आपस में बैर रखना

Hardeep Singh_
कहने को तो सभी धर्म इंसान को एक मानते हैं पर अगर ऐसा होता तो धर्मों की जरूरत ही क्या थी।
वास्तविकता यह है कि सभी धर्मावलम्बी दूसरे धर्म के प्रति नफरत के सिवा कुछ नहीं रखते।
फिर चाहे वो हिन्दू हों मुस्लिम, सिख या ईसाई हों, सब का एक जैसा नजरिया है।
मजहब ही सिखाता है आपस में बैर रखना।

मजहब और धर्म

Ajay Kumar

अगर भगवान् के एक भक्त को और एक नास्तिक को किसी गहरी नदी में फेंक दिया जाय,

तो वही जिंदा बचेगा जिसे तैरना आता है,

अगर इन दोनों में से एक हिन्दू और एक मुसलमान हो तो भी वही जिंदा बचेगा जिसे तैरना आता है,

अल्लाह और ईश्वर अपने नियम को नहीं तोड़ता,

अल्लाह और ईश्वर का अपना कोई धर्म या मजहब नहीं है,

यानी वह ना हिन्दू है ना मुसलमान,

अगर कोई आपको ऐसा बता रहा है कि सिर्फ आपके अल्लाह या आपके ईश्वर में यकीन करने वाले को जन्नत या स्वर्ग मिलेगा तो आपको ऐसा बताने वाला आपको बेवकूफ बना रहा है,

मैं भी पहले पूजा पाठ करता था,

तब मैं काफी डरा हुआ और अपने दिमाग में अँधेरा महसूस करता था,

जब से मैंने साइंस और तर्क के आधार पर सोचना शुरू किया,

मन से ईश्वर का डर खत्म होने लगा, सभी सवालों के जवाब मिलने लगे, दिमाग के अँधेरे खत्म होने लगे,

अब मैं बहुत खुश और सुलझा हुआ महसूस करता हूँ,

अब मुझे ना किसी धर्म वाले से नफरत होती है ना किसी की जाति की वजह से उसे छोटा या बड़ा मानता हूँ,

विज्ञान और तर्क के आधार पर सोचने की वजह से मुझे अब सभी इंसान एक जैसे लगने लगे हैं,

अब देशों की सीमाओं के भीतर कुढ़ते हुए, पड़ोसी देश से नफरतों से भरे हुए, दुसरे धर्म वालों को गालियाँ देते हुए, जातिवाद से भरे हुए लोगों को देख कर मुझे बहुत दया आती है,

मुझे महसूस होता है कि यह सब बेचारे बीमार लोग हैं,

अब मैं विज्ञान और तर्क के आधार पर सोचता हूँ तो मुझे लगता है कि पेड़, नदी, जानवर,पहाड़ और मैं सब एक ही हैं,

अब मैं आसपास की दुनिया और प्रकृति से ज्यादा प्यार महसूस करता हूँ,

सत्य जानना ही इंसान का धर्म है,

विज्ञान और तर्क ही सत्य को जानने का तरीका है,

जो लोग यह माने बैठे हैं कि जिस मजहब और धर्म में जन्म हो गया वही सबसे अच्छा और सच्चा है, वह सबसे नासमझ लोग हैं,

यकीन मानिए जब तक हम इन पुराने अंधे विश्वासों से आज़ाद नहीं होंगे ना युद्ध बंद होंगे, ना शांति आयेगी, ना नफरतें खत्म होंगी,

बुधवार, 21 जून 2017

कुंभ स्नान

Saurabh Varshney > ‎The Nastik World

आस्तिक बताते हैं कुम्भ नहाने से पाप धुल जाते हैं !
हम पूछतें हैं इतने पाप करते ही क्यों हो , की कुम्भ जाना पड़े ...!!

कथनी करनी

संजय कुमार

ऐसा क्यों है?-

ऐसा क्यों है की भारतीय जैसा कहते हैं वैसा अपने निजी जीवन मानते नहीं हैं?अर्थात कथनी करनी में इतना भारी अन्तर क्यों होता है? अक्सर जिन आदर्शो की बाते सार्वजानिक रूप से दुनिया के सामने करते हैं निजी जीवन में उन्ही आदर्शो के उलट काम करते हैं।

जैसे-

1- रोमेंटिक फिल्म यानि लड़का लड़की प्रेम आधारित फिल्मे भारत में खूब हिट होती हैं जिससे साफ़ जाहिर होता है की भारतीय लोग प्रेम / मुहब्बत को ज्यादा पसंद करते हैं ।पर जब इन्ही प्रेम पसंद लोगो के खुद के लड़का/ लड़की किसी दुसरे से प्रेम करने लग जाते हैं तो यही लोग इतने क्रोधित होते हैं की उनका क़त्ल तक कर देते हैं।

2- भारतीय हमेशा शौच ( साफ सफाई आदि स्वक्षता) की बाते करते हैं पर आदत यह है की कूड़ा घर के बाहर जंहा खाली जगह देखी डाल दिया। जंहा थोड़ी सुनसान दीवार देखी वंही हल्का हो लिए। गुटका पान खा के जंहा तहा धूकना तो जैसे जन्म जात हक़ हो भारतीयों का।

3- कहने को तो 'विश्व गुरु' कहते हैं पर बहुत बड़ी जनसँख्या अब भी निरक्षर है। संस्कृति की दुहाई देने वाले अपने बच्चे अंग्रेजी माध्यम स्कूल में पढ़ाते हैं।

4- कहने को तो ' बसुधैव कुटुम्बकम' पर सड़क पर कितना ही दीन हीन व्यक्ति पड़ा रहे उससे बचकर ऐसे निकल जाते हैं जैसे वह कोई जीता जागता इन्सान न होक कोई कूड़े का ढेर पड़ा हो।

5- हर भारतीय स्वदेशी अपनाने का नारा लगाये रहता है ,पर खुद के घर में ऐसी विदेशी चीजे होंगी की अंग्रेज भी नहीं समझ पायेगा की वह अपने घर में है या भारतीयों के घर में। चड्डी से लेके सूट तक और संडास की सीट से लेके लक्स्जरी कार तक सब अंग्रेजी स्टाइल। विदेशी वस्तुओ का उपयोग करने में अंग्रेज को भी मात देते हुए भारतीय

7- भारतीय ' सत्य' की बाते करते नहीं थकते परन्तु यदि की निजी जीवन में देखेंगे तो हमारे निजी जीवन में सत्य कही नहीं है ।हम अपना काम ' साम-दंड- भेद' की नीति से करवाने में यकीं रखते हैं । बच्चो को ईमानदारी का पाठ पढवाते नहीं थकते पर खुद ईमानदारी के ' ई'में भी विश्वास नहीं रखते।
हम दुनिया को दिखाने के लिए बेशक ' अहिंसा' के पुजारी कहलवाते नहीं हिचकिचाते पर हमारे आदर्श हमेशा से ' लौह पुरुष' ही रहते हैं। हम ताकतवर के सामने तुरंत हथियार दाल देते हैं और कमजोरो को दबाने के लिए हमेशा तैयार।

8- धर्म कर्म /मज़हब की बाते और ढोंग सारा दिन करेंगे किन्तु मानव मानव फर्क इतना करते हैं की दूसरे को अछूत और काफ़िर कह अपने से नीचा समझते हैं।

ये तो केवल कुछ मुख्य बाते थी,कोई भी विदेशी आसनी से ऐसी बहुत सी बातो के भारतीयों के जीवन में देख सकता है जो कहने और करने में सर्वदा भिन्न है रहती हैं ।यानि भारतीयों के आदर्शो में और कार्यो में एक दम उलट बाते मिलती हैं।

ऐसा क्यों है कुछ समझ आता है आपको?

- संजय