शनिवार, 10 जून 2017

भगत सिंह के विचार


B L Yadav

: वह 'भगत सिंह' जिसे हम जानते नहीं :

भगत सिंह हम में से अधिकतर के बचपन से हीरो रहे हैं. लेकिन फिर भी हम में से अधिकतर लोग अपने इस हीरो के बारे में बहुत कम जानते हैं. बस इतना ही जानते हैं कि वह एक स्वतंत्रता सेनानी था .. जो अंग्रेज के खिलाफ लड़कर 23 साल की छोटी सी उम्र में फांसी पर झूल गया.

भगत सिंह के व्यक्तित्व के एक बहुत ही अहम् व महतवपूर्ण पक्ष के बारे में हमें न तो बताया गया और ना ही हमने जानने की कोशिश की. वह पक्ष है उनकी सोचने की शक्ती. भगत सिंह एक बहुत बड़े विचारक थे. 23 साल की छोटी सी उम्र में ही उसने ढेर सारी किताबें पढ़ डाली थी. भगत के सोचने का तरीका बेहद तार्किक व विवेकपूर्ण था. अपने विवेक और तर्क शक्ती के आधार पर 23 साल की छोटी सी उम्र में ही वह समझ गए थे कि समाज के असली दुश्मन ईश्वर व धर्म हैं.

भगत का सपना भारत को अंग्रेज से आजाद कराना मात्र नहीं था. भगत का सपना इससे कहीं बड़ा था. उसका सपना था भारतीय समाज को ईश्वर व धर्म की गुलामी से मुक्ती दिलाना. भगतसिंह तर्क और विवेक को जीवन का आधार मानते थे. उनकी मान्यता थी कि धर्म और ईश्वर पर आधारित जीवन पद्धति मनुष्य को कमजोर बनाती है. इसके विपरीत नास्तिकता मनुष्य को अपने भीतर शक्ति की प्रेरणा देता है. इस शक्ति के आधार पर उसके भीतर स्वाभिमान पैदा होता है और वह किसी प्रकार के समझौते नहीं करता. भगतसिंह इस बात को भी समझ गए थे कि धर्म का उपयोग धर्म के ठेकेदार व सत्ताधारी आम लोगों के शोषण हेतु एक हथियार के तोर पर करते हैं. वे ईश्वर का उपयोग आम जनता में भय के निर्माण हेतु करते हैं.

काश भगत सिंह की इतनी कम उम्र में मृत्यु ना हुई होती !

भगत सिंह ने ईश्वर व धर्म के बारे में अपने विचार अपने लेख " Why I am Atheist " में खुलकर लिखे हैं. यह लेख भगत ने 1930 में लाहौर सेंट्रल जेल में फांसी लगाये जाने के कुछ समय पहले लिखा था और यह 27 सितम्बर 1931 को लाहौर के अखबार “ द पीपल “ में प्रकाशित हुआ. इस लेख में भगतसिंह ने ईश्वर कि उपस्थिति पर अनेक तर्कपूर्ण सवाल खड़े किये हैं और इस संसार के निर्माण, मनुष्य के जन्म, मनुष्य के मन में ईश्वर की कल्पना के साथ साथ संसार में मनुष्य की दीनता, उसके शोषण, दुनिया में व्याप्त अराजकता और और वर्गभेद की स्थितियों का भी विश्लेषण किया है.

इस लेख में भगतसिंह इस बात को स्वीकार करते हैं कि वे प्रारम्भ में नास्तिक नहीं थे, लेकिन फिर उन्होनें अध्ययन की शुरुआत की. उन्होनें बाकनिन को पढ़ा, मार्क्स को पढ़ा. फिर लेनिन व ट्राटस्की के बारे में पढ़ा, निर्लंब स्वामी की पुस्तक “ कॉमन सेन्स ” पढ़ी. बुद्ध, चार्वाक आदि विभिन्न दर्शनों का अध्ययन किया. वे फ़ाँसी के तख्ते पर जाने से पूर्व भी अध्ययन कर रहे थे.
इस तरह यह सब अध्ययन करने के पश्चात अपने विवेक और तर्क शक्ती के आधार पर वे ईश्वर को नकारने में सक्षम हुए.

भगतसिंह को अगर सम्पूर्ण रूप में जानना है तो यह लेख पढ़ना आवश्यक है. 
[please click to read - http://therationalistsociety.com/blogging/?p=56]

इस लेख के कुछ अंश यहाँ दिए गए हैं -

“ प्रत्येक मनुष्य को, जो विकास के लिए खड़ा है, रूढ़िगत विश्वासों के हर पहलू की आलोचना करनी होगी और उनको चुनौती देनी होगी.”

“ मुझे पूरा विश्वास है कि एक चेतन, परम-आत्मा का, जो कि प्रकृति की गति का दिग्दर्शन एवं संचालन करती है, कोई अस्तित्व नहीं है. ”

“ आस्तिकों से कुछ प्रश्न - यदि, जैसा कि आपका विश्वास है, एक सर्वशक्तिमान, सर्वव्यापक एवं सर्वज्ञानी ईश्वर है, जिसने कि पृथ्वी या विश्व की रचना की, तो कृपा करके मुझे यह बताएं कि उसने यह रचना क्यों की ? कष्टों और आफतों से भरी इस दुनिया में असंख्य दुखों के शाश्वत और अनंत गठबंधनों से ग्रसित एक भी प्राणी पूरी तरह सुखी नहीं है.

कृपया, यह न कहें कि यही उसका नियम है. यदि वह किसी नियम में बँधा है तो वह सर्वशक्तिमान नहीं. फिर तो वह भी हमारी ही तरह गुलाम है.

नीरो ने सिर्फ एक रोम जलाकर राख किया था. उसने चंद लोगों की हत्या की थी. उसने तो बहुत थोड़ा दुख पैदा किया, अपने शौक और मनोरंजन के लिए.और उसका इतिहास में क्या स्थान है ? उसे इतिहासकार किस नाम से बुलाते हैं ? सभी विषैले विशेषण उस पर बरसाए जाते हैं. जालिम, निर्दयी, शैतान-जैसे शब्दों से नीरो की भर्त्सना में पृष्ठ के पृष्ठ रंगे पड़े हैं. तब फिर तुम उस सर्वशक्तिमान अनंत नीरो को जो हर दिन, हर घंटे और हर मिनट असंख्य दुख देता रहा है और अभी भी दे रहा है, किस तरह न्यायोचित ठहराते हो ? ”

“ मैं पूछता हूँ कि उस ईश्वर ने यह दुनिया बनाई ही क्यों थी ? ऐसी दुनिया जो सचमुच का नर्क है, अनंत और गहन वेदना का घर है. उसने इस विश्व और उसमें मनुष्यों का सृजन क्यों किया ? आनंद लूटने के लिए ? तब उसमें और नीरो में क्या फर्क है ?”

“ मुझे यह मानना पड़ता है कि आपके पूर्वज बहुत चालाक व्यक्ति थे. उन्होंने ईश्वर व धर्म के बारे में ऐसे सिद्धांत गढ़े जिनमें तर्क और अविश्वास के सभी प्रयासों को विफल करने की काफी ताकत है.
ईश्वर व धर्म के बारे में ये सारे सिद्धांत विशेषाधिकार युक्त लोगों के आविष्कार हैं. ये अपनी हथियाई हुई शक्ति, पूँजी तथा उच्चता को इन सिद्धान्तों के आधार पर सही ठहराते रहे हैं.”

“ मैं पूछता हूँ कि तुम्हारा सर्वशक्तिशाली ईश्वर हर व्यक्ति को उस समय क्यों नहीं रोकता है जब वह कोई पाप या अपराध कर रहा होता है? ये तो वह बहुत आसानी से कर सकता है. उसने क्यों नहीं लड़ाकू राजाओं को या उनके अंदर लड़ने के उन्माद को समाप्त किया और इस प्रकार विश्वयुद्ध द्वारा मानवता पर पड़ने वाली विपत्तियों से उसे क्यों नहीं बचाया? "

“ क्या तुम मुझसे पूछते हो कि मैं इस विश्व की उत्पत्ति और मानव की उत्पत्ति की व्याख्या कैसे करता हूँ ? ठीक है, मैं तुम्हें बतलाता हूँ. चार्ल्स डारविन ने इस विषय पर कुछ प्रकाश डालने की कोशिश की है. उसको पढ़ो. सोहन स्वामी की ‘सहज ज्ञान’ पढ़ो. तुम्हें इस सवाल का कुछ सीमा तक उत्तर मिल जाएगा. यह (विश्व-सृष्टि) एक प्राकृतिक घटना है. विभिन्न पदार्थों के, निहारिका के आकार में, आकस्मिक मिश्रण से पृथ्वी बनी. कब ? इतिहास देखो. इसी प्रकार की घटना का जंतु पैदा हुए और एक लंबे दौर के बाद मानव. डारविन की ‘जीव की उत्पत्ति’ पढ़ो. और तदुपरांत सारा विकास मनुष्य द्वारा प्रकृति से लगातार संघर्ष और उस पर विजय पाने की चेष्टा से हुआ. यह इस घटना की संभवतः सबसे संक्षिप्त व्याख्या है.”

“ समाज को इस ईश्वरीय विश्वास के विरूद्ध उसी तरह लड़ना होगा जैसे कि मूर्ति-पूजा तथा धर्म-संबंधी क्षुद्र विचारों के विरूद्ध लड़ना पड़ा था. इसी प्रकार मनुष्य जब अपने पैरों पर खड़ा होने का प्रयास करने लगे और यथार्थवादी बन जाए तो उसे ईश्वरीय श्रद्धा को एक ओर फेंक देना चाहिए और उन सभी कष्टों, परेशानियों का पौरुष के साथ सामना करना चाहिए.”

“ ईश्वर में विश्वास और रोज़-बरोज़ की प्रार्थना को मैं मनुष्य का सबसे अधिक स्वार्थी और गिरा हुआ काम मानता हूँ.”

“ मैंने उन नास्तिकों के बारे में पढ़ा है, जिन्होंने सभी विपदाओं का बहादुरी से सामना किया, अतः मैं भी एक मर्द की तरह फाँसी के फंदे की अंतिम घड़ी तक सिर ऊँचा किए खड़ा रहना चाहता हूँ.”

“ मेरे एक दोस्त ने मुझे प्रार्थना करने को कहा. जब मैंने उसे अपने नास्तिक होने की बात बतलाई तो उसने कहा, - ‘देख लेना, अपने अंतिम दिनों में तुम ईश्वर को मानने लगोगे.’ मैंने कहा, - ‘नहीं प्रिय महोदय, ऐसा नहीं होगा. ऐसा करना मेरे लिए अपमानजनक तथा पराजय की बात होगी.”

शुक्रवार, 9 जून 2017

गोबर विज्ञान


तुलसी पीपल रात में भी आक्सीजन छोड़ते हैं| _ गोबर विज्ञान

Sukhvinder Sidhani

Ajaib Jalalana
रात को अब कैसे सम्भव है पीपल का आक्सीजन छोड़ना,, जब सूर्य का प्रकाश ही नहीं होगा,, तो प्रकाश संश्लेषण क्रिया भी नहीं,, जब क्रिया नहीं तो आक्सीजन भी नहीं,,,
सजीव कोशिकाओं के द्वारा प्रकाशीय उर्जा को रासायनिक ऊर्जा में परिवर्तित करने की क्रिया को प्रकाश संश्लेषण (फोटोसिन्थेसिस) कहते है। प्रकाश संश्लेषण वह क्रिया है जिसमें पौधे अपने हरे रंग वाले अंगो जैसे पत्ती, द्वारा सूर्य के प्रकाश की उपस्थिति में वायु से कार्बनडाइऑक्साइड तथा भूमि से जल लेकर जटिल कार्बनिक खाद्य पदार्थों जैसे कार्बोहाइड्रेट्स का निर्माण करते हैं तथा आक्सीजन गैस (O2) बाहर निकालते हैं। प्रकाश संश्लेषण की प्रक्रिया में सूर्य के प्रकाश की उपस्थिति में पौधों की हरी पत्तियों की कोंशिकाओं के अन्दर कार्बन डाइआक्साइड और पानी के संयोग से पहले साधारण कार्बोहाइड्रेट और बाद में जटिल काबोहाइड्रेट का निर्माण होता है। इस प्रक्रिया में आक्सीजन एवं ऊर्जा से भरपूर कार्बोहाइड्रेट (सूक्रोज, ग्लूकोज, स्टार्च (मंड) आदि) का निर्माण होता है तथा आक्सीजन गैस बाहर निकलती है। जल, कार्बनडाइऑक्साइड, सूर्य का प्रकाश तथा क्लोरोफिल (हरितलवक) को प्रकाश संश्लेषण का अवयव कहते हैं। इसमें से जल तथा कार्बनडाइऑक्साइड को प्रकाश संश्लेषण का कच्चा माल कहा जाता है। प्रकाश संश्लेषण की प्रक्रिया सबसे महत्वपूर्ण जैवरासायनिक अभिक्रियाओं में से एक है।[1] सीधे या परोक्ष रूप से दुनिया के सभी सजीव इस पर आश्रित हैं। प्रकाश संश्वेषण करने वाले सजीवों को स्वपोषी कहते हैं।[2]

तर्कशील ग्रुप...

गुरुवार, 8 जून 2017

बच्चन की कविता

Salauddin Meer_

आर एस एस


Radheshyam Mahaseth _
बतौर गृह मंत्री सरदार पटेल ने 1948 में आरएसएस ( RSS) को प्रतिबंधित कर दिया | गोलवलकर सहित तमाम संघियों को जेल में ठूस दिया | आगे काफी समय तक प्रतिबंध लगा रहा | बाद में गोलवलकर के गिरगिराने और काफी अनुनय -विनय के पश्चात पटेल ने प्रतिबंध तो हटाया लेकिन इस शर्त के साथ कि संघ भविष्य में किसी राजनैतिक गतिविधियों में शामिल नही होगा सिर्फ सांस्कृतिक -सामाजिक कार्य ही करेगा | दरअसल संघ के उन्मादी -मनुवादी जिहादी मानसिकता का भान सरदार साहब को बखूबी हो चला था ,इसलिए उन्हें शक था कि अगर यह भड़काऊ -उन्मादी संगठन कभी राजनीति में आ गया तो देश में दंगा -हिंसा -हत्या की बाढ़ होगी और फिर मुल्क की अखंडता को सुरक्षित रखना नामुमकिन हो जाएगा | आज इस बात को लेकर बहस चल रही है कि क्या आरएसएस इस देश में कुछ वैसी ही मानसिकता को सींचने का काम कर रहा जैसा कि दुनिया के तमाम आतंकवादी संगठन करते है | इस बात पर बहस की गुंजाइश है और लोग अपने हवाले से तथ्यों और तर्कों के साथ आ भी रहे है | कोई पक्ष में तो कोई विपक्ष में | पिछले लगभग साल भर से मैं खुद निजी तौर से संघ की गतिविधियों को समझने की कोशिश में लगा हूँ | इस दौरान हमने गोलवलकर लिखित पुस्तकों सहित संघ से जुड़े कई किताबों और पत्रिकाओं का अध्ययन किया , संघ के विभिन्न शाखाओं -कार्यालयों में जा कर जुड़े लोगो -पदाधिकारियों से मिला और तमाम मुद्दों पर उनकी राय जानी | सभी चीजों को जानने समझने के बाद मैं जिस निष्कर्ष पर पहुंचा उसका लब्बोलुआब यही कि कट्टरता ,मनुवादी व्यवस्था और मुस्लिम विरोध ,यह तीन वह केंद्र बिंदु है जिसके इर्दगिर्द संघ की सारी गतिविधियाँ संचालित होती है | छोटे -छोटे बच्चे को दिमाग में मुसलमानों के खिलाफ जहर बोया जाता है , मनु की रचनाओं और विचारों को धर्म की चासनी में लपेट उस पुरातन मनुवादी युग को इस रूप में दिखाया जाता है मानों वह कोई सभ्यता का स्वर्णकाल रहा हो और हर बात में मुसलमानों के आगमन से पूर्व के भारत को ऐसे पेश किया जाता कि तमाम जातियों और वर्णों के होते हुए भी आपस में कोई वैर -भाव नही था ,हिन्दुस्तान में सब संपन्न और खुशहाल थे , आज जो भी समस्या है सबकी मूल वजह मुस्लिम शासन ही है | इस तरह के बिष उन बच्चों में भरा जाता और दिन -रात सुबह -शाम कट्टरता की जो घुट्टी पिलाई जाती वह किसी आतंकवादी को मिलने वाले कट्टर जिहादी प्रशिक्षण जैसा ही होता है | हालांकि संघ से जुड़े कई लोग ऐसे भी मिले जिन्होंने व्यक्तिगत रूप से माना कि संघ को अब अपने उस पुराने मोड से बाहर आना होगा क्योकिं आज के इस हिन्दुस्तान में उन पुरानी बातों की प्रसंगिकता नही रह गई | यानी संघ के भीतर भी कुछ प्रगतिशील लोग है लेकिन उनकी चलती नही जब तक कि वह मोदी जैसी किसी मजबूत स्थिति में न पहुँच जाए |

मातृ/पितृ सत्ता


संजय कुमार

मनुष्य के शिकारी बनने से पहले स्त्री और पुरुष के आधिकर बराबर थे क्यों की उस समय तक मुख्य जरूरत भोजन थी जो की कंदमूल ,फल आदि एकत्रित करने से पूरी हो जाती थी । संचय करने की प्रवृति नहीं थी अतः वर्चस्व को लेके संघर्ष नगण्य था ।

भालों के प्रयोग आ जाने के बाद पुरुष द्वारा शिकार करना आसान हो गया। चुकी शिकार के पीछे भागना ,पकड़ना आदि कार्यो में शारीरिक ऊर्जा अधिक लगती थी जो की पुरुष के शारीरिक बनावट के अनुरूप थी । स्त्रियों के साथ दूसरी समस्या उनका गर्भवती होना भी थी,गर्भवती अवस्था में स्त्री शिकार नहीं कर सकती थी अतः वह महीनो शिकार करना छोड़ देती ।

शिकार में कम सक्रियता के कारण शिकार करना मुख्य रूप से पुरुषो का पेशा हो गया , शिकार के बाद पशुपालन और चरवाही का उदय हुआ जो की पशुओं से ही जुड़े थे जिससे पूर्ण रूप से आर्थिक सत्ता पुरुषो के हाथ में आ गई और इस प्रकार पितृसत्तामक पक्ष उभर के सामने आया।

जब स्त्रियों ने कृषि की खोज की तो स्थति पलटी और आर्थिक सत्ता स्त्रियों के पक्ष में आ गई । तब मातृसत्ता के उदय से पितृसत्तामक या तो खत्म हो गया या निष्क्रिय प्रभाव में आ गया। आज भी जंहा कृषि प्रमुख राज्य है जैसे बंगाल / असम उनमे मातृसत्तामक पक्ष की मजबूती आसानी से देखी जा सकती है ।

किन्तु हल की खोज ने फिर से सत्ता पलट दी और कृषि पुरुषो के हाथ आ गई । हल और अन्य कृषि औजारों की खोज ने कृषि को सरल और अधिक लाभकारी बना दिया जिससे पुरुषो का अधिक से अधिक कृषि में भाग लेना जारी रहा , अतः वह वक्त भी आ गया जब कृषि पर पूर्ण रूप से पुरुष का कब्ज़ा हो गया और मातृसत्तत्मक पक्ष को खत्म कर पितृसत्तामक पक्ष कायम हो गया।

आर्यो की मूल प्रवृति पशु चरवाही ही रही , ईरान में कृषि इतनी उन्नत नहीं थी अतः वँहा पशुचारवाही ही मूल आर्थिक संपन्नता का आधार बनी रही।
आप ऋग्वेद में देखेंगे कि इसमें मूल रूप से पशुधन की ही कामना की गई है , इंद्र से अनार्यो से उनके पशु( गाय आदि) छीनने की स्तुतियाँ हैं।

ब्राह्मणिक ग्रन्थो में कृषि को इतना घृणित कार्य माना गया कि इसे शूद्रों का कार्य घोषित कर दिया गया । ब्राह्मण के लिए हल की मुठिया पकड़ना भी पाप निर्धारित कर दिया गया ।

संभवतः स्त्री और शूद्र को इसी लिए एक श्रेणी में रखा गया ...

क्रमशः

- संजय

मंगलवार, 6 जून 2017

कसम खाई है

Sneha Singh_कोई हिन्दू कोई मुस्लिम कोई ईसाई है सब ने इंसान न बनने की क़सम खाई है

आस्था और बुद्धि में ऋणात्मक सहसंबंध

Sneha Singh _ये कुछ कुछ अर्कमडीज़ के सिद्धान्त की तरह है । जितनी आस्था दिमाग में घुसेगी उतनी बुद्धि दिमाग से निकल जाएगी ।

कथा सार

Santosh Vishwakarma

पंडित जी ने एक कथा सुनाई।।।।।
"कथा का सार था इंसान साथ कुछ नहीं ले जाता"
कथा खत्म होने के बाद एक शंखनाद और सारा माल समेट पंडित जी चलते बने।।।।

शनिवार, 3 जून 2017

ढकोसला

Santosh Sharma

धार्मिक कर्मकांडों का ढकोसला है श्राद्ध कर्म

संतोष शर्मा

मृत्यु के बाद मृत्य आत्मा की मुक्ति के नाम पर पाखंडी पंडितों और पुरोहितों द्वारा विभिन्न प्रकार के कर्मकांडों के जरिये अपनी उल्लू सीधा कर रहे हैं।

इंसान की मृत्यु के बाद उसकी आत्मा की भी मौत हो जाती है। किन्तु पाखंडी पुरोहित और पंडित द्वारा मृत आत्मा को सदगति प्राप्त कर के नाम पर श्राद्ध जैसे कर्मकांडों को बनाया गया है। और इन कर्मकांडों के सहारे इन पाखंडों की दुकान आज भी चल रही है।

परन्तु मेरे जैसे युक्तिवादी इन कर्मकांडों को अन्धविश्वास बताकर उसे मानने से इंकार करता तो , उस व्यक्त ये पंडित या पुरोहित विभिन्न प्रकार से यह समझने या डराने का प्रयास किया करते हैं कि यदि मृत व्यक्ति का धार्मिक रीति-रिवाज के साथ दाह-संस्कार नहीं किया गया तो उसकी आत्मा को मुक्ति नहीं मिलेगी। आत्मा भटकती रहेगी।

किन्तु सच तो यह है कि किसी इंसान की मृत्यु के साथ ही उसकी आत्मा की भी मृत्यु हो जाती है। और मृत्य आत्मा के भटकने की बात एक कल्पना मात्र है।

वास्तव में धर्म और अंधविश्वास के नाम पर ठगी का धंधा चलने वाले इन पंडितों और पुरोहितों को यह पता है कि अगर लोग आत्मा , ईश्वर में विश्वास करना छोड़ दे तो उनकी दुकानदारी बंद हो जाएगी। दूसरों की खून-पसीने की कमाई पर हाथ मरने के मौका नहीं मिलेगा।

आज मुझ जैसे युक्तिवादीओं की वजह से मुफ्त की कमाई खाने वाले पंडितों और पुरोहितों की रातों की नींद उड़ने लगी हैं।

पौधा लगाएं


ममता गुप्ता ने वाट्सएप ग्रुप विचार मंच में भेजा है_
अपील 
आज लोगों को लग रहा है कि गर्मी बहुत लग रही है। 
पर कब तक AC का सहारा लेंगे, आज हिन्दुस्तान में 150 करोड़ पेड़ की जरूरत है।
अभी तो यह शुरुआत हैं। 45 से 50 डिग्री को 55 से 60 होने में देर नहीं लगेगी। अभी से समझ जाओ और पौधे लगाने की शुरुआत कर दें। क्योंकि एक पौधे को बड़ा होने मे 5 से 7 साल लग जाएगे। 
सब कुछ सरकार पर मत छोडिये, कुछ तो खुद किया करे। 
आज से नियम ले किसी भी शुभ अवसर पर कम से कम एक पौधा जरूर लगाएं और उसे अपनी पसंद का नाम दे एवं उनका ख्याल रखना। 
यकीन मानिए यह आपका एक अच्छा अनुभव होगा।,,,,,,,, आपका🙏🙏

अंधविश्वासों की खेती

PM Panda_
"अंधविश्वासों की खेती!"
********************
कल्पना करें कि यदि अंधविश्वास कोई फसल होती और मनुष्य के खाने के काम आती तो कितना मज़ा आता?
मैं दावे के साथ कह सकता हूँ कि हमारा देश विश्व में सदैव प्रथम स्थान पर रखता और अग्रणी कहलाता।
अंधविश्वासों के बीज हमारे देश में प्रचुर मात्रा में पाये जाते हैं। गाँव हो या शहर हर जगह इसकी उपस्थिति देखी जा सकती है।
पढ़ा लिखा हो या अनपढ़ कोई बात नहीं दोनों अंधविश्वासों पर विश्वास करने में बराबर योग्यता रखते हैं।
हमारे देश में अंधविश्वासों की खेती करने के लिए न केवल उपयुक्त उर्वरा भूमि है वल्कि इसकी फसल को लहलहाने के लिए योग्य मजदूर और किसान भी पर्याप्त मात्रा में पाये जाते हैं।
रेती से तेल निकालने से लेकर कोई भी कठिन कार्य अंधविश्वासों के सहारे किया जा सकता है!
हमारे अंधविश्वासी अपने हुनर में इतने माहिर हैं कि वे मूर्तियों के आंख से आँसू निकलवा सकते हैं। यही नहीं मूर्तियों को दूध पिलाने में भी सिद्ध हस्त हैं।
आज से हजारों साल पहले समुद्र का मंथन किया गया था।[क्या आज की तारीख में हम समुद्र का मंथन कर सकते हैं?बिलकुल नहीं]
समुद्र मंथन से क्या क्या पाया वह आपने जरूर सुना होगा।
एक चीज का जिक्र करूँगा वह है""अमृत"
उस अमृत को पता नहीं कौन कौन पी गये?लेकिन जिसने भी पिया था वह सामने क्यों नहीं आता है?
खैर;अंधविश्वासों की खेती तो बिना कुछ किये हो ही रही है देखते हैं यह खेती कब तक होती रहेगी।
[पद्ममुख पंडा महापल्ली]

शुक्रवार, 2 जून 2017

प्रेम बर्ताव


Ravi Kumar > ‎तर्कशील समाज

एक हिन्दू के साथ बुरा बर्ताव हुआ।
सभी हिंदुओं को बुरा लगा ।
एक मुस्लिम के साथ बुरा बर्ताव हुआ।
सभी मुस्लिमों को बुरा लगा ।
ये कैसी मानसिकता?
हमारे दिल में दूसरे समुदाय के लिय प्रेम क्यों नही ।

गौमाता


Dinesh Aastik

आप गाय को माता मानते हैं, मुझे कोई आपत्ति नहीं। आपके पशु प्रेम का दिल से स्वागत है। पर भैंस, बकरी, मुर्गी आदि को भी कुछ मानिये। इनसे भी किसी तरह का रिस्ता जोड़िये। इनकी हत्या पर भी प्रतिबंध लगाने की मांग कीजिये।

अंधविश्वास

Rattan Lal Gottra

मोर के आँसुओं से, 
ऐनटीना धारी पैदा होते हैं, 
मुख से, 
नाक से, 
कान से, 
भुजाओं से, 
उदर से,
जंघाओ से, 
पैरो से, 
ऐ चमत्कार दुनियाँ के किसी कोने में ,
कहीं नही हो सकते ऐसे अविष्कार...
सिर्फ और सिर्फ ,
ऐनटीनाधारी ही कर सकते हैं, 
ऐ बिना संभोग के ही, 
मोर के आँसुओ से ,
मोरनी को गर्भवती कर सकते हैं, 
रावण की दहाड से,
छःमहीने का मंदोदरी का, 
गर्भ गिरा,
मटके में रखा, 
जमी में दफन किया 
फिर सीता पैदा कर सकते हैं...!!
वही मंदोदरी को, 
मेंढकी से पैदा बता सकते हैं, 
हिरनी के साथ संभोग करते कश्यप ,
मानव पैदा कर सकते हैं, 
हनुमंत के, 
पसीने की एक बूँद से, 
मछली गर्भधारण करती, 
मकराध्वज पैदा कर सकते हैं, 
ऐ अपने ही पुत्र का, 
जिसे जानते भी नहीं, 
सिर काट देते हैं, 
पुत्रमोह में पागल, 
निरीह हाँथी के बछड़े का, 
सिर काटकर लगा सकते हैं, 
इतने ही बडे चमत्कारक हो, 
तो क्यो नहीं... 
जो सिर काटा था गनेश का, 
वही सिर लगा देते, 
या फिर बदलकर ,
गनेश का सिर ,
हाँथी के बच्चे के धड से जोड देते,
तो थोडी इज्जत बच जाती ,
ऐंटिनाधारियों सुने...! 
ऐ मैं नहीं तुम और तुम्हारे, 
तथाकथित धर्मग्रंथ बोलते हैं, 
तथा स्वयंभू बने तैतीस करोड, 
देवी, देवता न जाने ,
कहाँ कहाँ से पैदा हो जाते हैं, 
किस किस का रुप, 
कैसे कैसे रख लेते हैं, 
मसलन गाय के शरीर में, 
तैतीस करोड समा जाते हैं, 
और कोई जानवर नहीं मिला, 
कुछ नहीं मिला तो जानवरों को, 
बाँट लिया सवारी के लिए, 
पंक्षीयों को भी नहीं बक्शा, 
इमरत इकलावी....

अच्छा या खराब समय


Saleem Ahmed Wastik

वक्त या समय,,,,, कभी ख़राब नहीं होता,,,! 
जो समय आपके लिए ख़राब है,,, वही समय औरों के लिये अच्छा हो सकता है ! 
समय को अपने अनुकूल करने वाला ही मनुष्य है ! 
किसी ख़ुदा-भगवान के चक्कर में अपनी लाईफ़ मत खराब करें !!!!

मोर, गाय और मुर्खों के विज्ञान


Uday Singh

मोर और गाय पर अंधविश्वास जाने सही तथ्य -
=======================इस देश को क्या हो गया है ? जज से लेकर पढे लिखे लोग तक बेवकूफी की बात करने लगे है और फेसबुक पर बहस होने लगती है जबकि ऐसी चीजो पर बहस नही होनी चाहिए उसका पुरजोर खंडन कर देनी चाहिए ।
मोर सिर्फ आसू पीकर गर्भवती हो जाती है कि जानकारी के लिए मै एक प्रोफेसर डाक्टर अजय पांडेय को फोन किया जो zoology मे पीएचडी है ।पहले तो वह हसने लगे और हमे ही बोलने लगे कि आप डाक्टर होकर इस बात को क्यो पूछे ।मोर एक विकसित पक्षी है उसके शरीर की एनाटामी है फिजियोलॉजी है जनन अंग है ।विना sperm और ovum के संयोग से कोई गर्भवती कैसै होगा ।जो ऐसा कहता है बेवकूफ और पागल होगा और बेवकूफ पागलो की बात पर बहस नही करते । जब मैने कहा कि जज ने बोला है तो वे कहने लगे यार कोई काल्पनिक कहानी मे कह दिया होगा ।
×××××××××××××××××××××××
एक दुसरा अंधविश्वास खूब लिखा जा रहा है और भाजपा के विद्वान उसका खूब समर्थन कर रहे है कि गाय आक्सीजन लेती है और आक्सीजन देती है इसलिए पूजनीय है ।उस पर मेरे मित्र ने कहानी वैसै पागलो के कमरे मे दस गाय बांधकर कमरा बंद कर रात भर भक्त को सुला दो सुबह पता चल जायेगा कि आक्सीजन देती है कि कार्बन डाई आक्साईड देती है ।कोई जीव अगर आक्सीजन लेगा तो भोजन पचाने मे आक्सीजन खपत होगी और कार्बन डाई आक्साइड निकलेगी । यह भैस सुवर गदहा सबके लिए सत्य है ।पर कुछ लोग इतने भावुक है कि मान रहे है कि नही गाय आक्सीजन लेती है और छोडती भी है ।यह सोच एकदम वेवकूफी भरा है । 
इस समय मुरखो का जमाना है जरा बच कर रहे ।

गुरुवार, 1 जून 2017

झूठ

Dinesh Aastik

संसार के तीन बड़े झूठ, जिस पर धार्मिक मूर्ख आज भी यकीन करते हैं।

1. मुहम्मद साहब का चाँद के दो टुकड़े कर देना।
2. हनुमान का सूरज को निगल जाना।
3. ईसा महीस का पुनः जिन्दा हो जाना।

सच है धर्म मूर्खता और झूठ का संकलन है।

हमारे आविष्कार

सरकारी नौकरी-( Indian Government Jobs in Central/State Government)

एक अमेरिकन बोला भाई साहब बताइये अगर
आपका भारत महान है तो सँसार के इतने
आविष्कारों में आपके देश का क्या योगदान
है ??
हिन्दुस्तानी - अरे अमरीकन सुन !!
१. संसार की पहली फायर प्रूफ लेडी भारत में
हुई !! नाम था "होलिका" आग में
जलती नही थी !!
इसीलिए उस वक्त फायर ब्रिगेड
चलती नही थी!!
२. संसार की पहली वाटर प्रूफ बिल्डिँग
भारत
में हुई !! नाम था भगवान विष्णु
का"शेषनाग" !!
काम तो ऐसे जैसे "विशेषनाग" !!
३. दुनिया के पहले पत्रकार भारत में हुए !!
"नारदजी" जो किसी राजव्यवस्था से
नही डरते थे !! तीनों लोक की सनसनी खेज
रिपोर्टिँग करते थे !!
४. दुनिया के पहले कॉँमेन्टेटर"संज य" हुये,
जिन्होंने नया इतिहास बनाया !!महाभारत के
युद्ध का आँखो देखा हाल अँधे "ध्रतराष्ट"
को उन्ही ने सुनाया !!
५. दादागिरी करना भी दुनिया हमने
सिखाया क्योंकि वर्षो पहले हमारे"शनिदेव"
ने
ऐसा आतँक मचाया कि "हफ्ता"
वसूली का रिवाज
उन्ही के शिष्यो ने चलाया !! आज भी उनके
शिष्य
हर शनिवार को आते है ! उनका फोटो दिखाकर
हफ्ता ले जाते है !!
6-दुनिया का पहला Bodybuilder -अंजलि पुत्र हनुमान और दूसरा Bodybuilder - भीम 
तब तुमरा American Arnold पैदा भी नहीं हुआ था
अमेरिकन बोला दोस्त फालतू की बातें मत
बनाओ !
कोई ढ़ंग का आविष्कार हो तो बताओ !! जैसे
हमने
इँसान की किडनी बदल दी, बाईपास
सर्जरी कर
दी आदि !!
हिन्दुस्तानी बोला रे अमरीकन
सर्जरी का तो आइडिया ही दुनिया को हमने
दिया था !! तू ही बता "गणेशजी"
का ऑपरेशन
क्या तेरे बाप ने किया था !!
अमरीकन हडबडाया !! गुस्से मेँ बडबडाया!!
देखते ही देखते चलता फिरता नजर आया !!
तब से
पूरी दुनिया को हम पर मान है!!! दुनिया में
देश कितने ही हो पर सबमें मेरा "भारत" महान
है..