Radha Krishnan Sharma _
मैं लाता हूँ अपना क़ुरान
तुम अपनी गीता निकालो
दोनों को आग लगाकर
जलालो
उसपर एक पतीला
चावल का चढ़ालो !
देख लेना
तुम्हारे चावल
पकने से पहले ही
आग बुझ जायेगी !
लेकिन...
यह न समझो
इनमें ताक़त नहीं !
रददी के यहि पुलिंदे
पूरे गाँव में
आग लगा सकते है
पूरे शहर को जला सकते है
पूरे मुल्क में
दंगा और फसाद
करा सकते है
लेकिन
घर का चूल्हा
नहीं जला सकते
चावल नहीं पका सकते !
क्योंकि इनका ईजाद
भूख मिटाने के लिए नहीं
बल्कि
घरों को फूंकने के लिए
ही हुआ है !
रद्दी के यही पुलिंदे
गरीब का पेट
नहीं भर सकते
लेकिन
दंगाइयों को नेता
जरूर बना देते हैं !
रद्दी के यही पुलिंदे
एक वक्त का
चूल्हा नहीं जला सकते
लेकिन अमीरों को
सत्ता तक
जरूर पहुंचा सकते हैं !
एक गरीब के लिए
गीता और कुरान
बंदरिया के
मरे हुए बच्चे के समान है
जो बंदरिया उसे
सीने से चिपकाये रहती है !
नेताओ और मठाधीसों के लिए
मुल्लाओं और न्यायाधीशों के
लिए
रद्दी के यही पुलिंदे
जीवंत होते है
उन्हें ऊर्जा देते हैं !
अमन और शांति के लिए
परिवर्तन और क्रांति के लिए
रद्दी के इन पुलिंदों को..
आग में झोंकना ही होगा
आग में झोंकना ही होगा !!
--
-- नदीम हिंदुस्तानी।
सत्य को जानने की कोशिश करनी चाहिए. सत्य जानने के लिए उलट पुलट हर तरह के विचार पढ़ कर सोचना चाहिए. किसी लोखी गई या कही गई बात को आँख बंद कर नहीं मानना चाहिए. सत्य ही सुन्दर है. सत्य ही कल्याणकरी है.
शनिवार, 5 नवंबर 2016
गीता और कुरान
ध्यान रखें
Kamomajra_ 👇👇👇👇👇👇👇👇
*यह हमेशा ध्यान रखे*
1) 🤑🌶🍒 *निम्बू-मिर्च* खाने के लिये है.. कही *टाँगने* के लिए नहीं है....
2) 😱🐈 *बिल्लियाँ* जंगली या पालतू जानवर है, बिल्ली के *रास्ता काटने* से कुछ गलत नहीं होता.. बल्कि चूहों से होनेवाले नुक्सान को बचाया जा सकता है.....
.
3) 🗣💨 *छींकना* एक नैसर्गिक क्रिया है , छींकने से कुछ *अनहोनी* नहीं होती ना हि किसी काम में बाधा आती है- छींकने से शरीर की *सुप्त पेशियां* सक्रीय हो जाती है...
4) 💀🌳 *भूत* पेड़ों पर नहीं रहते - पेड़ों पर *पक्षी*रहते है.....
5) 🔬🔭 *चमत्कार* जैसी कोई चीज नहीं होती - हर घटना के पिछे *वैज्ञानिक* कारण होता है.....
6) ⛄☃ *भोपा, बाबा* जैसे लोग *झुठे* होते है- जिन्हें *शारारिक मेहनत* नहीं करनी ये वही लोग है.....
7) ⛈🌪👺🔥 *जादू टोणा*, या *किसी ने कराया* ऐसा कुछ नहीं होता, ये दुर्बल लोगोंके *मानसिक विकार* है....
जादू-टोणा करके आपके ग्रहो की दिशा बदलने वाले बाबा, हवा और मेघों की दिशा बदलकर बारिश नहीं ला सकते...?⛈☁🌒💫
8 ) 🌏🐠 *वास्तुशास्त्र* भ्रामक है. सिर्फ दिशाओ का *डर* दिखाकर लूट...
वास्तविक तो पृथ्वी ही खुद हर क्षण *अपनी दिशा* बदलती है.... अगर *कुबेर जी* उत्तर दिशा में है तो एक ही स्थान या दिशा में *अमीर* और *गरीब* दोनों क्यों पाये जाते है?..... .
9) 👼🐓🐐🍇🍎 *मन्नत,पूजा, बलि, टिप* या *चढ़ावे* से भगवान प्रसन्न होकर *फल* देते है, तो क्या भगवान् *रिश्वतखोर* है?..... आध्यात्म *मोक्ष* के लिए है, *धन* कमाने के लिए नहीं.....
यह मेसैज 15 दूसरे ग्रूप्स में भेजने से कोई *खुशखबरी* नहीं मिलेगी...और इसको डिलीट करने पर कोई अनहोनी भी नहीं होगी। पर Farword करने से आपके कई मित्र *मेहनत*और *कर्म* का महत्त्व जरूर जान सकेंगे...
🙏🌹🙏🌹🕉🌹🙏🌹🙏
शुक्रवार, 4 नवंबर 2016
पृथ्वी
Shayad kokas Durg_
🔷तो आखिर हमारी पृथ्वी कैसे बनी ?🔷
▪आइये ,इस सिद्धांत के आधार पर देखें कि हमारी पृथ्वी कैसे बनी । साढ़े चार अरब वर्ष पूर्व सूर्य के निकट से एक पिन्ड गुजरा ,दोनों पिन्डों में आकर्षण हुआ । सूर्य से जो तंतु निकला कालांतर में उसके ठंडे होने पर तथा द्रव्य के शीतली करण के कारण उसके छोटे छोटे पिंड बने । ये तमाम पिंड उस सूर्य की परिक्रमा करने लगे जो उनका जनक था । यह सभी पिंड ग्रह कहलाये जिनमें हमारी पृथ्वी भी एक ग्रह है और उसके भाई बहन हैं अन्य ग्रह । इस तरह हमारी पृथ्वी और अन्य ग्रहों का जन्म हुआ ।
▪यहाँ यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि यह ग्रह आकर्षण के कारण एक दूसरे के करीब आने के बावज़ूद टकराते क्यों नहीं ? इसका उत्तर यह है कि गुरुत्वाकर्षण के कारण सभी ग्रह अपनी-अपनी कक्षा में रहकर सूर्य का चक्कर लगाते हैं । हर ग्रह की वक्रता की एक निर्धारित गति होती है जो उसके जन्म सें निर्धारित हो चुकी होती है और वही बनी रहती है । सब ग्रहों की वक्रता की गति अलग-अलग होती है लेकिन सब एक ही तल पर होते हैं इसलिए एक दूसरे से नहीं टकराते और अपनी अपनी कक्षा में घूमते रहते हैं ।
▪वक्रता की गति से प्राप्त बल उन्हें सूर्य से दूर करता है जबकि गुरुत्वाकर्षण ग्रहों को सूर्य की ओर खींचता है।
इन दोनों के बीच संतुलन की वजह से ही ग्रह सूर्य से टकराकर नष्ट नहीं होते बल्कि चारों ओर घूमते रहते हैं ।
यही हाल उन उपग्रहों का भी है वे भी अपने जनक गृह का ऐसे ही चक्कर लगाते हैं और कम अधिक गुरुत्वाकर्षण के बावजूद एक सन्तुलन बनाकर घूमते रहते हैं । चन्द्रमा पृथ्वी के इर्दगिर्द घूमता है और पृथ्वी सूर्य के इर्द गिर्द घुमती है ।
अब घूम फिर कर फिर वही बात सामने आ जाती है कि इन शक्तियों के पीछे कौन हैं ? सीधी सी बात है , इन शक्तियों के पीछे इनकी अपनी सत्ता है और किसी ईश्वरीय सत्य की कल्पना सिर्फ मनुष्य के मानस की उपज है ।
▪तात्पर्य यह कि हमारे सबसे करीब यही ग्रह है जिस पर हम खड़े हैं जिसका सबसे ज्यादा प्रभाव हम पर होता है लेकिन इसका हमारी कुंडली में इस ग्रह का कोई स्थान नहीं है । भूकंप आने पर पृथ्वी हिलती है हमारा सब कुछ बरबाद हो जाता है लेकिन प्रभाव उस शनि का बताया जाता है जो हमसे लाखों किलोमीटर दूर है । हम यह भूल जाते हैं कि ज्योतिषियों द्वारा प्रदत्त यह ज्ञान उस ज़माने का है जब विज्ञान ऐसी गणनाएं करने में असमर्थ था । आज हमारे पास सिर्फ कल्पनाएँ नहीं हैं बल्कि प्रयोगों के आधार पर स्थापित विज्ञान के ठोस सिद्धांत हैं । बहरहाल इतनी कल्पना तो हम कर ही सकते हैं कि वह पिन्ड जिसके आकर्षण के फलस्वरूप हमारे सौरमंडल की उत्पत्ति हुई , हो सकता है अपनी संतानों के साथ बृह्मांड में कहीं विचरण कर रहा हो ।
▪इस प्रकार यह पृथ्वी जन्म लेने के पश्चात प्रारम्भ में विभिन्न प्रकार की गैस से मिलकर बना एक विशालकाय पिंड थी जो अपने अक्ष पर घूमती हुई सूर्य की परिक्रमा कर रही थी । ताप के विकीरण के फलस्वरूप यह पिंड ठंडा हुआ ,द्रव्य व गैसों का शीतलीकरण हुआ तथा तरलीय व अर्धसान्द्रीय अवस्थाओं से होता हुआ वर्तमान अवस्था तक पहुंचा। बाहरी तल से घनीकरण प्रारम्भ हुआ,उपरी सतह पर पपड़ी जमी जो भीतर की ओर मोटी होती गई। गर्भ भाग में सिकुड़ना प्रारंभ हुआ, पपड़ी में झुर्रियाँ व दरारें पड़ीं फलस्वरूप हिमालय जैसे पर्वत और नदियाँ बनीं । यह सब घटित होने में कई करोड़ साल लगे ।
▪दिमाग पर ज़्यादा ज़ोर मत लगाइये चलिए अपने घर में ठंडे होते हुए दूध पर मलाई जमते हुए देखिए और इस पर विचार कीजिए । ठंडी होती हुई पृथ्वी पर समुद्र , पहाड़ , नदियाँ , झीलें , चट्टानें ऐसे ही बनी होंगी ।
▪और किराये की बात भी भूल जाईये यह तो एक बहुत बड़ा बाड़ा है जो जितना पुराना किरायेदार उसका उतना हक़ । वही किरायेदार वही मकान मालिक, जैसे अफ्रिका जैसे बड़े देश और हमारे जैसे छोटे , या फिर अमेरिका जैसे नए किरायेदार जिन्होंने अपनी चालाकी से मकान पर ही कब्ज़ा कर लिया । फिर हर देश में भी कुछ बड़े बड़े धन्ना सेठ और ढेरों हमारे जैसे फुटपाथिये । इस धरती पर रहने की कीमत न वो देते है न हम । अपने बड़े बड़े उद्योगों से प्रदूषण फैलाकर पृथ्वी का सबसे ज्यादा नुकसान वे करते हैं और इलज़ाम हमारे सर पर कि हम प्रदूषण फैलाते हैं ,जंगल काटते हैं, ज़मीन से पानी चूस लेते हैं और नुकसान करते हैं इस पृथ्वी का ।
▪मुम्बई की चालें देखी हैं ना , जब तक धराशायी नहीं होती लोग खाली ही नहीं करते ,फिर कई लोग दब कर मर भी जाते हैं । हालाँकि उनके रहने के लिए और कहीं ठिकाना भी तो नहीं होता सो जाएँ तो जाएँ कहाँ । पीढियां बीत जाती हैं उनकी फुटपाथों पर । यह लोग भी धीरे धीरे पृथ्वी को उसी विनाश की ओर ले जा रहे हैं जहाँ न ये पृथ्वी रहेगी न हम । आप कहेंगे हमें क्या ? हमारी आनेवाली पीढ़ीयाँ जानें । हम तो चैन से रह ही लेंगे अपने जीते जी ।
▪लेकिन ऐसा नहीं है भाई.. आधी रात को जब यह पृथ्वी हिलती है तब समझ में आता है कि कहीं न कहीं कुछ गड़बड़ तो है , या फिर बाढ़ का पानी जब देहरी छूने लगता है और खेतों में फसलों को बर्बाद कर देता है तब लगता है कि ऐसा सोचना सही नहीं है । या फिर भोपाल गैस कांड की तरह आधी रात को उठकर भागना पड़ता है तो पता चलता है कि मल्टी नॅशनल्स की गलतियों का खामियाज़ा हमें भुगतना पड़ रहा है ।
▪हालाँकि यह इतना आसान नहीं है , इसके पीछे एक षडयंत्र भी है जो विकास के नाम पर विश्व की पूंजीपति सरकारें कर रही हैं , बांधों की जरुरत से ज्यादा ऊंचाई , जंगल और जमीन पर मल्टी नेशनल कंपनियों को कारखाने के लिए लाइसेंस , नदियों का जल बेचने की अनुमति , ज़मीन से जल का दोहन विकास के नाम पर आपके खेतों का अधिग्रहण ।
▪यह पृथ्वी न उनकी है न हमारी लेकिन इसके नष्ट होते जाने का दोष सिर्फ हम पर क्यों ? सोचा है कभी ?
NDTV
Mag Tarkasheel_ दस बातें जिनके लिए NDTV इंडिया को बैन किया जाना चाहिए।
1- क्योंकि NDTV इंडिया जादू -टोना , करिश्मा ,चमत्कार जैसी खबरें नहीं दिखाता।
2- क्योंकि NDTV इंडिया चपड़गंजू बाबाओं को लाकर दिन का राशिफल और भविष्य नहीं दिखाता।
3- क्योंकि NDTV इंडिया जब सारे चैनल सास बहू और साज़िस, झगड़े चला रहे होते हैं तो वह देश से जुडी और खबरें चला रहा होता है।
4- क्योंकि NDTV इंडिया इंटरटेंमेंट के किन चैनलों TRP कहाँ पहुंची ,कौन सा सीरियल इस सप्ताह हिट जायेगा ,कौन सा पिछले सप्ताह फ्लॉप रहा ,ये सब नहीं दिखता।
5- क्योंकि NDTV इंडिया आपको सवाल करने को कहता है, किसी भी खबर पर आँख मूदकर भरोसा करने से रोकता है।
6-क्योंकि NDTV इंडिया सरकार की गलत नीतियों को खुलकर बिना चाटुकारिता के दिखाता है।
7- क्योंकि NDTV इंडिया दलितों पर अत्याचार ,आदिवासियों का मुद्दा ,ब्राह्मणवाद और संघ की करतूतों को बेझिझक दिखाता है।
8-क्योंकि NDTV इंडिया आम जनता को(not bhakts) निष्पक्ष चैनल लगता है और सेकुलरिज्म की बात करता है।
9-क्योंकि NDTV कुशवाहा समेत अन्य वंचित वर्गों की वर्तमान स्थिति और जनसँख्या व सम्राट अशोक महान पर डिबेट कराता है l
10- और सबसे अहम् और महत्वपूर्ण ये की NDTV इंडिया के एंकर Ravish kumar को बेस्ट एंकर का अवार्ड मिलता है।
आस्तिक नास्तिक
जब कोई भगवान के अस्तित्व को जान जाएगा तत्काल आस्तिक हो जाएगा| स्वाभाविक है मैं भी| फिलहाल मैं आस्तिक नहीं, नास्तिक भी नहीं हूं|
धर्म का व्यवसाय
इश्क इश्क़ शर्मा प्यार से _
भ्रष्टाचार पाप व् अपराध में फसे #पापी लोग उबरने को मंदिर मस्जिद जाते है। दान पुण्य कर के स्वर्ग में अपना आरक्षण करते है। उनका धार्मिक होना स्वभाविक है, पर किसी मूर्ति को कही रख वहाँ देवालय स्थापित कर के अपना व्यवसाय बना लेना... सिर्फ भारत देश में होता है..
अन्य देशों में प्रतियोगिता नही चलती मंदिर मस्जिद गिरजाघर या गुरुद्वारा की...!!
वहाँ के लोगो का हृदय के साथ साथ दिमाग भी चलता है।
कण कण में भगवन है, पर किसी particular पत्थर को उठा के भगवान बना देने की कला में भारतवर्ष से आगे कोई नही...💐💐💐
मेरी सोच है, किसी भी धर्म या जाती को ठेस पहुँचाना मकसद नही।।
गुरुवार, 3 नवंबर 2016
सहसंबध
हमारे देश में बहूत धार्मिक लोग हैं, भ्रष्टाचार पाप भी बहुत है| क्या दोनो में धनात्मक सहसंबंध है?
धर्म और स्वर्ग
अधिकतर लोग जीवन भर पाप करते हैं | अंत समय के पहले वह बहुत धार्मिक हो जाते हैं| पूजा पाठ, भजन कीर्तन करने लगते हैं भगवान का मस्का लगाते हैं स्वर्ग में आरक्षण के लिए|
धर्म
[11/3, 17:14] N R Pradhan: *दुनिया का सबसे बड़ा मजाक और ढकोसला क्या है* 😜😀😀❓❓❓❓❓
*आप जब भी किसी धामिक व्यक्ति से भगवान् के बारे में पूछेंगे तो वो अपने धर्म संप्रदाय को ही सत्य और एकलौता प्रमाणिक भगवान बताएगा ।।*
*लकिन जब आप उससे दो चार तार्किक प्रश्न पूछेंगे तो वो कहेगा*😀😀👆👆
*सभी धर्म का स्वरुप भले ही अलग अलग हो किन्तु ईश्वर एक है ।।*
👆👆😀😀😀😇😇😇
*इसके बाद जब आप किसी धार्मिक हिन्दू या धार्मिक मुस्लिम से कहेंगे की जब ईस्वर एक है तो किसी मंदिर में अल्लाह मिया की फ़ोटो रख के पुजा करो*😀😀
*या किसी मस्जिद में हिन्दू देवी देवता की फ़ोटो रखकर नमाज पढ़ो*😀😀😀
*तब इन पाखंडियो की सारी धूर्तता और धार्मिक पागलपन सामने आ जाता है ।।*
😀😀😀
*पाखंडियो अब कहो ईस्वर एक है और कहा रहता है ये भी बता देना ।।*
👆👆😀😀😀😜😜😜✔✔✔✔✔✔✔✔
*नास्तिक बनो ।।*
*तर्कशील बनो ।।*
*सच्चे देश भक्त बनो ।।*
*प्रकृति ही एक मात्र प्रमाणिक भगवान् है ।। जिसकी कृपा के बिना कोई भी व्यक्ति चाहे वो किसी भी धर्म का हो ......एक मिनट भी जिन्दा नहीं रह सकता ।।*
*ऑक्सीज़न मंदिर या मस्जिद की मूर्ति पैदा नहीं करती ये प्रकृति के अनुपम भेंट है सभी जीव धारियों को ।।*
*चाहे वो धार्मिक इंसान हो या बिना धर्म के पशु पक्षी ।।*
👆👆😀😀😀✔✔✔
[11/3, 17:15] N R Pradhan: Yugal Pradhan ne whatsapp group विचार मंच में भेजा है|
शनिवार, 29 अक्टूबर 2016
शिव लिंग
नेहा नरुका की कविता 'पार्वती योनि'
ऐसा क्या किया था शिव तुमने ?
रची थी कौन-सी लीला ? ? ?
जो इतना विख्यात हो गया तुम्हारा लिंग
माताएं बेटों के यश, धन व पुत्रादि के लिए
पतिव्रताएँ पति की लंबी उम्र के लिए
अच्छे घर-वर के लिए कुवाँरियाँ
पूजती है तुम्हारे लिंग को,
दूध-दही-गुड़-फल-मेवा वगैरह
अर्पित होता है तुम्हारे लिंग पर
रोली, चंदन, महावर से
आड़ी-तिरछी लकीरें काढ़कर,
सजाया जाता है उसे
फिर ढोक देकर बारंबार
गाती हैं आरती
उच्चारती हैं एक सौ आठ नाम
तुम्हारे लिंग को दूध से धोकर
माथे पर लगाती है टीका
जीभ पर रखकर
बड़े स्वाद से स्वीकार करती हैं
लिंग पर चढ़े हुए प्रसाद को
वे नहीं जानती कि यह
पार्वती की योनि में स्थित
तुम्हारा लिंग है,
वे इसे भगवान समझती हैं,
अवतारी मानती हैं,
तुम्हारा लिंग गर्व से इठलाता
समाया रहता है पार्वती योनि में,
और उससे बहता रहता है
दूध, दही और नैवेद्य...
जिसे लाँघना निषेध है
इसलिए वे औरतें
करतीं हैं आधी परिक्रमा
वे नहीं सोच पातीं
कि यदि लिंग का अर्थ
स्त्रीलिंग या पुल्लिंग दोनों है
तो इसका नाम पार्वती लिंग क्यों नहीं ?
और यदि लिंग केवल पुरूषांग है
तो फिर इसे पार्वती योनि भी
क्यों न कहा जाए ?
लिंगपूजकों ने
चूँकि नहीं पढ़ा ‘कुमारसंभव’
और पढ़ा तो ‘कामसूत्र’ भी नहीं होगा,
सच जानते ही कितना हैं?
हालांकि पढ़े-लिखे हैं
कुछ ने पढ़ी है केवल स्त्री-सुबोधिनी
वे अगर पढ़ते और जान पाते
कि कैसे धर्म, समाज और सत्ता
मिलकर दमन करते हैं योनि का,
अगर कहीं वेद-पुराणऔर इतिहास के
महान मोटे ग्रन्थों की सच्चाई!
औरत समझ जाए
तो फिर वे पूछ सकती हैं
संभोग के इस शास्त्रीय प्रतीक के-
स्त्री-पुरूष के समरस होने की मुद्रा के-
दो नाम नहीं हो सकते थे क्या?
वे पढ़ लेंगी
तो निश्चित ही पूछेंगी,
कि इस दृश्य को गढ़ने वाले
कलाकारों की जीभ
क्या पितृसमर्पित सम्राटों ने कटवा दी थी
क्या बदले में भेंट कर दी गईं थीं
लाखों अशर्फियां,
कि गूंगे हो गए शिल्पकार
और बता नहीं पाए
कि संभोग के इस प्रतीक में
एक और सहयोगी है
जिसे पार्वती योनि कहते हैं
(नेहा नरुका महात्मा गाँधी अंतर्राष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय में शोध सहायक हैं.)
शुक्रवार, 28 अक्टूबर 2016
धनतेरस के दिन खरीदी
कहते हैं कि धन तेरस के दिन सामान सोना चांदी बर्तन जमीन कार बंगला... खरीदने से शुभ होता है, धन की वर्षा होती है|
लेकिन मैं इस दिन खरीदने से डरता हूँ मैं भी धनी न हो जाऊँ| फिर धन संपत्ति की रक्षा की चिंता में मेरी नींद में कमी न हो जाए|
राय दें
नीचे दिए गए दो वाक्यों पर अपनी राय दें|
अ - पहले नियम कानून बनाने वाले बड़े बेवकुफ थे, पर अब नही|
ब - पहले की अपेक्षा आज के लोग अधिक इंटेलिजेंट हैं|
धर्म का झुनझुना
Ram Bahadur Pandey _
🌹प्रायः सभी कथित धर्मों के धर्माचारियों ने एक अन्धों का समाज निर्मित किया और कहा कि तुम्हें अपनी आंखों की कोई आवश्यकता नही है| तुम्हें देखने की नहीं, बस भरोसे की ,श्रद्धा की अनुकरण करने की जरूरत है| इन धर्माचारियों ने यह कहते हुए कि तुम सोचोगे ,विचार करोगे और चिन्तन करोगे तो असली मार्ग से भटक जाओगे , सोचने समझने व चिन्तन करने के अधिकार से वंचित कर दिया ।
ऐसा लगता है कि यह तथाकथित धर्माचारी नही चाहते किसी की सन्देह की धार तेज हो या बुद्धि पैनी हो । वह यही चाहते हैँ कि सब मरे मरे से , किसी तरह अपने को घसीटते हुए मन्दबुद्धि और प्रतिभाहीन बने रहें । इन धर्माचारियों ने मन्दबुद्धि बनाने मे सफलता ही नहीं हासिल की बल्कि इनके हाथ मे विश्वास और श्रद्धा नामक झुनझुना भी पकड़ा दिया , जिसे हम आंख बन्द करके बजाते फिर रहे हैँ ।🌷
गुरुवार, 27 अक्टूबर 2016
मंगलवार, 25 अक्टूबर 2016
राम राज्य
राम राज्य- ओशो
राम के समय को तुम रामराज्य कहते हो। हालात आज से भी बुरे थे। कभी भूल कर रामराज्य फिर मत ले आना | एक बार जो भूल हो गई, हो गई। अब दुबारा मत करना
रामराज्य में शूद्र को हक नहीं था वेद पढ़ने का! यह तो कल्पना के बाहर थी बात कि डाक्टर अंबेदकर जैसा शूद्र और राम के समय में भारत के विधान का रचयिता हो सकता था| असंभव। खुद राम ने एक शूद्र के कानों में सीसा पिघलवा कर भरवा दिया था--गरम सीसा, उबलता हुआ सीसा! क्योंकि उसने चोरी से, कहीं वेद के मंत्र पढ़े जा रहे थे, वे छिप कर सुन लिए थे। यह उसका पाप था यह उसका अपराध था। और राम तुम्हारे मर्यादा पुरुषोत्तम हैं! राम को तुम अवतार कहते हो! और महात्मा गांधी रामराज्य को फिर से लाना चाहते थे। क्या करना है? शूद्रों के कानों में फिर से सीसा पिघलवा कर भरवाना है? उसके कान तो फूट ही गए होंगे। शायद मस्तिष्क भी विकृत हो गया होगा। उस गरीब पर क्या गुजरी, किसी को क्या लेना-देना| शायद आंखें भी खराब हो गई होंगी। क्योंकि ये सब जुड़े हैं; कान, आंख, नाक, मस्तिष्क, सब जुड़े हैं। और दोनों कानों में अगर सीसा उबलता हुआ|
तुम्हारा खून क्या खाक उबल रहा है निर्मल घोष! उबलते हुए शीशे की जरा सोचो! उबलता हुआ सीसा जब कानों में भर दिया गया होगा, तो चला गया होगा पर्दों को तोड़ कर, भीतर मांस-मज्जा तक को प्रवेश कर गया होगा| मस्तिष्क के स्नायुओं तक को जला गया होगा। फिर इस गरीब पर क्या गुजरी, किसी को क्या लेना-देना है! धर्म का कार्य पूर्ण हो गया। ब्राह्मणों ने आशीर्वाद दिया कि राम ने धर्म की रक्षा की। यह धर्म की रक्षा थी|
और तुम कहते हो, मौजूदा हालात खराब हैं|
युधिष्ठिर जुआ खेलते हैं, फिर भी धर्मराज थे! और तुम कहते हो, मौजूदा हालात खराब हैं! आज किसी जुआरी को धर्मराज कहने की हिम्मत कर सकोगे? और जुआरी भी कुछ छोटे-मोटे नहीं, सब जुए पर लगा दिया। पत्नी तक को दांव पर लगा दिया|
एक तो यह बात ही अशोभन है, क्योंकि पत्नी कोई संपत्ति नहीं है। मगर उन दिनों यही धारणा थी, स्त्री-संपत्ति! उसी धारणा के अनुसार आज भी जब बाप अपनी बेटी का विवाह करता है, तो उसको कहते हैं कन्यादान क्या गजब कर रहे हो! गाय-भैंस दान करो तो भी समझ में आता है। कन्यादान कर रहे हो| यह दान है? स्त्री कोई वस्तु है? ये असभ्य शब्द, ये असंस्कृत हमारे प्रयोग शब्दों के बंद होने चाहिए। अमानवीय हैं, अशिष्ट हैं, असंस्कृत हैं।
मगर युधिष्ठिर धर्मराज थे। और दांव पर लगा दिया अपनी पत्नी को भी| हद्द का दीवानापन रहा होगा। पहुंचे हुए जुआरी रहे होंगे। इतना भी होश न रहा। और फिर भी धर्मराज धर्मराज ही बने रहे| इससे कुछ अंतर न आया। इससे उनकी प्रतिष्ठा में कोई भेद न पड़ा। इससे उनका समादर जारी रहा।
भीष्म पितामह को ब्रह्मज्ञानी समझा जाता था। मगर ब्रह्मज्ञानी कौरवों की तरफ से युद्ध लड़ रहे थे! गुरु द्रोण को ब्रह्मज्ञानी समझा जाता था। मगर गुरु द्रोण भी कौरवों की तरफ से युद्ध लड़ रहे थे! अगर कौरव अधार्मिक थे, दुष्ट थे, तो कम से कम भीष्म में इतनी हिम्मत तो होनी चाहिए थी! और बाल-ब्रह्मचारी थे और इतनी भी हिम्मत नहीं? तो खाक ब्रह्मचर्य था यह! किस लोलुपता के कारण गलत लोगों का साथ दे रहे थे? और द्रोण तो गुरु थे अर्जुन के भी, और अर्जुन को बहुत चाहा भी था। लेकिन धन तो कौरवों के पास था |पद कौरवों के पास था| प्रतिष्ठा कौरवों के पास थी। संभावना भी यही थी कि वही जीतेंगे। राज्य उनका था। पांडव तो भिखारी हो गए थे। इंच भर जमीन भी कौरव देने को राजी नहीं थे।
और कसूर कुछ कौरवों का हो, ऐसा समझ में आता नहीं। जब तुम्हीं दांव पर लगा कर सब हार गए, तो मांगते किस मुंह से थे? मांगने की बात ही गलत थी। जब हार गए तो हार गए। खुद ही हार गए, अब मांगना क्या है?
लेकिन गुरु द्रोण भी अर्जुन के साथ खड़े न हुए; खड़े हुए उनके साथ जो गलत थे।
यही गुरु द्रोण एकलव्य का अंगूठा कटवा कर आ गए थे अर्जुन के हित में, क्योंकि तब संभावना थी कि अर्जुन सम्राट बनेगा। तब इन्होंने एकलव्य को इनकार कर दिया था शिक्षा देने से। क्यों? क्योंकि शूद्र था।
और तुम कहते हो, "मौजूदा हालात बिलकुल पसंद नहीं|
निर्मल घोष, एकलव्य को मौजूदा हालात उस समय के पसंद पड़े होंगे? उस गरीब का कसूर क्या था अगर उसने मांग की थी, प्रार्थना की थी कि मुझे भी स्वीकार कर लो शिष्य की भांति, मुझे भी सीखने का अवसर दे दो? लेकिन नहीं, शूद्र को कैसे सीखने का अवसर दिया जा सकता है|
मगर एकलव्य अनूठा युवक रहा होगा। अनूठा इसलिए कहता हूं कि उसका खून नहीं खौला। खून खौलता तो साधारण युवक, दो कौड़ी का। सभी युवकों का खौलता है, इसमें कुछ खास बात नहीं। उसका खून नहीं खौला। शांत मन से उसने इसको स्वीकार कर लिया। एकांत जंगल में जाकर गुरु द्रोण की प्रतिमा बना ली। और उसी प्रतिमा के सामने शर-संधान करता रहा। उसी के सामने धनुर्विद्या का अभ्यास करता रहा। अदभुत युवक था। उस गुरु के सामने धनुर्विद्या का अभ्यास करता रहा जिसने उसे शूद्र के कारण इनकार कर दिया था; अपमान न लिया। अहंकार पर चोट तो लगी होगी, लेकिन शांति से, समता से पी गया।
धीरे-धीरे खबर फैलनी शुरू हो गई कि वह बड़ा निष्णात हो गया है। तो गुरु द्रोण को बेचैनी हुई, क्योंकि बेचैनी यह थी कि खबरें आने लगीं कि अर्जुन उसके मुकाबले कुछ भी नहीं। और अर्जुन पर ही सारा दांव था। अगर अर्जुन सम्राट बने, और सारे जगत में सबसे बड़ा धनुर्धर बने, तो उसी के साथ गुरु द्रोण की भी प्रतिष्ठा होगी। उनका शिष्य, उनका शागिर्द ऊंचाई पर पहुंच जाए, तो गुरु भी ऊंचाई पर पहुंच जाएगा। उनका सारा का सारा न्यस्त स्वार्थ अर्जुन में था। और एकलव्य अगर आगे निकल जाए, तो बड़ी बेचैनी की बात थी।
तो यह बेशर्म आदमी, जिसको कि ब्रह्मज्ञानी कहा जाता है, यह गुरु द्रोण, जिसने इनकार कर दिया था एकलव्य को शिक्षा देने से, यह उससे दक्षिणा लेने पहुंच गया! शिक्षा देने से इनकार करने वाला गुरु, जिसने दीक्षा ही न दी, वह दक्षिणा लेने पहुंच गया! हालात बड़े अजीब रहे होंगे! शर्म भी कोई चीज होती है! इज्जत भी कोई बात होती है! आदमी की नाक भी होती है! ये गुरु द्रोण तो बिलकुल नाक-कटे आदमी रहे होंगे! किस मुंह से--जिसको दुत्कार दिया था--उससे जाकर दक्षिणा लेने पहुंच गए!
और फिर भी मैं कहता हूं, एकलव्य अदभुत युवक था; दक्षिणा देने को राजी हो गया। उस गुरु को, जिसने दीक्षा ही नहीं दी कभी! यह जरा सोचो तो! उस गुरु को, जिसने दुत्कार दिया था और कहा कि तू शूद्र है! हम शूद्र को शिष्य की तरह स्वीकार नहीं कर सकते!
बड़ा मजा है! जिस शूद्र को शिष्य की तरह स्वीकार नहीं कर सकते, उस शूद्र की भी दक्षिणा स्वीकार कर सकते हो| मगर उसमें षडयंत्र था, चालबाजी थी।
उसने चरणों पर गिर कर कहा, आप जो कहें। मैं तो गरीब हूं, मेरे पास कुछ है नहीं देने को। मगर जो आप कहें, जो मेरे पास हो, तो मैं देने को राजी हूं। यूं प्राण भी देने को राजी हूं।
तो क्या मांगा? मांगा कि अपने दाएं हाथ का अंगूठा काट कर मुझे दे दे|
जालसाजी की भी कोई सीमा होती है! अमानवीयता की भी कोई सीमा होती है! कपट की, कूटनीति की भी कोई सीमा होती है! और यह ब्रह्मज्ञानी! उस गरीब एकलव्य से अंगूठा मांग लिया। और अदभुत युवक रहा होगा, निर्मल घोष, दे दिया उसने अपना अंगूठा| तत्क्षण काट कर अपना अंगूठा दे दिया! जानते हुए कि दाएं हाथ का अंगूठा कट जाने का अर्थ है कि मेरी धनुर्विद्या समाप्त हो गई। अब मेरा कोई भविष्य नहीं। इस आदमी ने सारा भविष्य ले लिया। शिक्षा दी नहीं, और दक्षिणा में, जो मैंने अपने आप सीखा था, उस सब को विनिष्ट कर दिया। osho