*नास्तिक* न तो बना जा सकता है और न तो बनाया जा सकता है बल्कि यह एक स्थिति है जब व्यक्ति शैक्षिक,बौद्धिक,तर्क व विचारशील हो जाता है तो उसके अंदर से अंधविश्वास व पाखण्ड समाप्त हो जाता है इसके बाद जो स्थिति बचती है वह है नास्तिकता!
जय विज्ञान
सत्य को जानने की कोशिश करनी चाहिए. सत्य जानने के लिए उलट पुलट हर तरह के विचार पढ़ कर सोचना चाहिए. किसी लोखी गई या कही गई बात को आँख बंद कर नहीं मानना चाहिए. सत्य ही सुन्दर है. सत्य ही कल्याणकरी है.
गुरुवार, 15 जून 2017
नास्तिकता
दूसरों के भगवान
-- Stephen F. Roberts
हिन्दी अनुवाद :
"जब आप इस बात को समझ जाओगे कि आप दूसरों के भगवान (Gods ) को क्यों नहीं मानते, तब आपको यह भी समझ आ जायेगा कि हम आपके भगवान को क्यों नहीं मानते."
सीधी सी बात है ....
जिन कारणों से आप दूसरों के भगवान को काल्पनिक मानते हो, ठीक उन्हीं कारणों के आधार पर हम आपके भगवान को काल्पनिक मानते हैं.
धर्म एक पाखंड
धर्म एक पाखण्ड है और ईश्वर झूठ
चलो एक बार मान लेते कि हैं सबको तथा सबकुछ अल्लाह ने बनाया है। लेकिन भाई हिन्दुओं, ईसाईयोें, यहूदियों, सिक्खों, नास्तिकों, काफिरों और विधर्मियों को क्यों बनाया है?
चलो एक बार मान लेते हैं कि सबको तथा सब कुछ ब्रम्हा ने बनाया है लेकिन भाई मुस्लिमों, ईसाईयों, यहूदियों सिक्खों, जैनियों नास्तिकों, काफिरों और विधर्मियों को क्यों बनाया है?
नहीं जानता
"मैं नहीं जानता!"
**************
मैं किसी परमसत्ता के बारे में
कुछ भी नहीं जानता!
लोग अक्सर ईश्वर;खुदा या पैगंबर की
चर्चा करते रहते हैं
मैं सुन लेता हूँ;सुनता रहता हूं
मगर ऐसे किसी को भी नहीं मानता।
बचपन से लेकर आज तलक
मेरा किसी ईश्वर से सामना नहीं हुआ
मैंने तो सिर्फ लोगों को
मंदिरों के सामने कीर्तन भजन गाते
मंदिरों के भीतर गिडगिडाते देखा है
मैंने कभी भी नहीं देखा
कि ईश्वर किसी पर पसीजा हो
मैंने देखा है कई बार
लोग उपवास व्रत लेकर
कई कई दिनों तक
भूखे ही दिन गुजार देते हैं
मैं साक्षी हूँ उन भक्तों का
जो भगवान को पाने के प्रयास में
प्राण त्याग देते हैं।
मुझे ज्ञात है किस तरह एक माँ
अपने नवजात शिशु की लाश पर
आँसू बहाती है
एक नव विवाहिता वधू
पति की मृत्यु पर गश खाती है
सारे अरमान टूट बिखर जाते हैं
दुनिया फिर तमाशा बनाती है।
मैं ऐसे किसी भगवान को नहीं जानता
जो किसी दुर्घटना ग्रस्त व्यक्ति को
बचाने के लिए सामने आया हो
बाढ़ में डूबता कोई आदमी
भगवान का नाम लेकर बच पाया हो
किताबों में पढ़ते हैं
बुजुर्गों से सुनते हैं
कभी आँखों के सामने से
ऐसा कुछ भी नहीं गुजरा
जो हमें भगवान के होने का यकीन दिला सके!
पद्ममुख पंडा; महापल्ली
बुधवार, 14 जून 2017
मंगलवार, 13 जून 2017
कांग्रेस पार्टी
आजादी के बाद गांधी जी ने कांग्रेस पार्टी को भंग करने की सलाह दी थी क्योंकि कांग्रेस के गठन का मकसद पूरा हो चुका था| लेकिन पार्टी को भंग नहीं किया गया| किसी सलाह को मानने की बाध्यता नहीं होती|
अगर आजादी के बाद कांग्रेस को भंग कर पुनः "कांग्रेस" नाम से ही एक पार्टी का गठन कर लेते| उसमें वही पूर्व कांग्रेसी सदस्य होते| तो क्या नए कांग्रेस दल को बहुमत नहीं मिलता? किसे बहुमत मिला होता| भारतीय जनसंघ, हिंदू महासभा या आर एस एस को?
रविवार, 11 जून 2017
हमारा धर्म महान
हमारा हिंदू धर्म महान है| हम विधर्मियों को क्यों शामिल करें?
इतिहास साक्षी है कि हिन्दु धर्म से लोग ईसाई बने, यहूदी बने, सिख बने, जैन बने,बौद्ध बने और इस्लाम धर्म भी ग्रहण किया ।
किन्तु क्या कोई ऐसा एक भी उदाहरण है कि इन धर्मो के लोगो ने अपना धर्म त्याग कर कभी हिन्दु धर्म ग्रहण किया हो?
या वर्तमान मे कर रहे हो?
कोई तो विशेष कारण होगा, कि हिन्दू धर्म को ही त्यागकर नया धर्म बनाने और ग्रहण करने के अनगिनत उदाहरण है।
कोई तो कमी जरूर होगी?
महान संस्कृति व उच्च सभ्यता, धर्म और सास्वत सत्य का प्रतीक??
हिन्दू धर्म??
यानि अपने ही मुँह मियां मिट्ठू बनने की कहावत को चरितार्थ करता हिन्दू धर्म
😊
😊
शनिवार, 10 जून 2017
अवतरण
यदा यदाहि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत अभ्युत्थाम्यहं युगे युगे.. पाप भ्रष्टाचार तो खूब हो रहे हैं| अवतरित कब होंगे?
नाप तौल
अम्बेडकर महान थे कोई शक नहीं लेकिन आजकल जय भीम वाले यही जप रहे हैं| वे गांधी से बड़े थे, मार्क्स से बड़े थे... पता नहीं कैसे नाप जोख कर रहे हैं?
भगत सिंह के विचार
: वह 'भगत सिंह' जिसे हम जानते नहीं :
भगत सिंह हम में से अधिकतर के बचपन से हीरो रहे हैं. लेकिन फिर भी हम में से अधिकतर लोग अपने इस हीरो के बारे में बहुत कम जानते हैं. बस इतना ही जानते हैं कि वह एक स्वतंत्रता सेनानी था .. जो अंग्रेज के खिलाफ लड़कर 23 साल की छोटी सी उम्र में फांसी पर झूल गया.
भगत सिंह के व्यक्तित्व के एक बहुत ही अहम् व महतवपूर्ण पक्ष के बारे में हमें न तो बताया गया और ना ही हमने जानने की कोशिश की. वह पक्ष है उनकी सोचने की शक्ती. भगत सिंह एक बहुत बड़े विचारक थे. 23 साल की छोटी सी उम्र में ही उसने ढेर सारी किताबें पढ़ डाली थी. भगत के सोचने का तरीका बेहद तार्किक व विवेकपूर्ण था. अपने विवेक और तर्क शक्ती के आधार पर 23 साल की छोटी सी उम्र में ही वह समझ गए थे कि समाज के असली दुश्मन ईश्वर व धर्म हैं.
भगत का सपना भारत को अंग्रेज से आजाद कराना मात्र नहीं था. भगत का सपना इससे कहीं बड़ा था. उसका सपना था भारतीय समाज को ईश्वर व धर्म की गुलामी से मुक्ती दिलाना. भगतसिंह तर्क और विवेक को जीवन का आधार मानते थे. उनकी मान्यता थी कि धर्म और ईश्वर पर आधारित जीवन पद्धति मनुष्य को कमजोर बनाती है. इसके विपरीत नास्तिकता मनुष्य को अपने भीतर शक्ति की प्रेरणा देता है. इस शक्ति के आधार पर उसके भीतर स्वाभिमान पैदा होता है और वह किसी प्रकार के समझौते नहीं करता. भगतसिंह इस बात को भी समझ गए थे कि धर्म का उपयोग धर्म के ठेकेदार व सत्ताधारी आम लोगों के शोषण हेतु एक हथियार के तोर पर करते हैं. वे ईश्वर का उपयोग आम जनता में भय के निर्माण हेतु करते हैं.
काश भगत सिंह की इतनी कम उम्र में मृत्यु ना हुई होती !
भगत सिंह ने ईश्वर व धर्म के बारे में अपने विचार अपने लेख " Why I am Atheist " में खुलकर लिखे हैं. यह लेख भगत ने 1930 में लाहौर सेंट्रल जेल में फांसी लगाये जाने के कुछ समय पहले लिखा था और यह 27 सितम्बर 1931 को लाहौर के अखबार “ द पीपल “ में प्रकाशित हुआ. इस लेख में भगतसिंह ने ईश्वर कि उपस्थिति पर अनेक तर्कपूर्ण सवाल खड़े किये हैं और इस संसार के निर्माण, मनुष्य के जन्म, मनुष्य के मन में ईश्वर की कल्पना के साथ साथ संसार में मनुष्य की दीनता, उसके शोषण, दुनिया में व्याप्त अराजकता और और वर्गभेद की स्थितियों का भी विश्लेषण किया है.
इस लेख में भगतसिंह इस बात को स्वीकार करते हैं कि वे प्रारम्भ में नास्तिक नहीं थे, लेकिन फिर उन्होनें अध्ययन की शुरुआत की. उन्होनें बाकनिन को पढ़ा, मार्क्स को पढ़ा. फिर लेनिन व ट्राटस्की के बारे में पढ़ा, निर्लंब स्वामी की पुस्तक “ कॉमन सेन्स ” पढ़ी. बुद्ध, चार्वाक आदि विभिन्न दर्शनों का अध्ययन किया. वे फ़ाँसी के तख्ते पर जाने से पूर्व भी अध्ययन कर रहे थे.
इस तरह यह सब अध्ययन करने के पश्चात अपने विवेक और तर्क शक्ती के आधार पर वे ईश्वर को नकारने में सक्षम हुए.
भगतसिंह को अगर सम्पूर्ण रूप में जानना है तो यह लेख पढ़ना आवश्यक है.
[please click to read - http://therationalistsociety.com/blogging/?p=56]
इस लेख के कुछ अंश यहाँ दिए गए हैं -
“ प्रत्येक मनुष्य को, जो विकास के लिए खड़ा है, रूढ़िगत विश्वासों के हर पहलू की आलोचना करनी होगी और उनको चुनौती देनी होगी.”
“ मुझे पूरा विश्वास है कि एक चेतन, परम-आत्मा का, जो कि प्रकृति की गति का दिग्दर्शन एवं संचालन करती है, कोई अस्तित्व नहीं है. ”
“ आस्तिकों से कुछ प्रश्न - यदि, जैसा कि आपका विश्वास है, एक सर्वशक्तिमान, सर्वव्यापक एवं सर्वज्ञानी ईश्वर है, जिसने कि पृथ्वी या विश्व की रचना की, तो कृपा करके मुझे यह बताएं कि उसने यह रचना क्यों की ? कष्टों और आफतों से भरी इस दुनिया में असंख्य दुखों के शाश्वत और अनंत गठबंधनों से ग्रसित एक भी प्राणी पूरी तरह सुखी नहीं है.
कृपया, यह न कहें कि यही उसका नियम है. यदि वह किसी नियम में बँधा है तो वह सर्वशक्तिमान नहीं. फिर तो वह भी हमारी ही तरह गुलाम है.
नीरो ने सिर्फ एक रोम जलाकर राख किया था. उसने चंद लोगों की हत्या की थी. उसने तो बहुत थोड़ा दुख पैदा किया, अपने शौक और मनोरंजन के लिए.और उसका इतिहास में क्या स्थान है ? उसे इतिहासकार किस नाम से बुलाते हैं ? सभी विषैले विशेषण उस पर बरसाए जाते हैं. जालिम, निर्दयी, शैतान-जैसे शब्दों से नीरो की भर्त्सना में पृष्ठ के पृष्ठ रंगे पड़े हैं. तब फिर तुम उस सर्वशक्तिमान अनंत नीरो को जो हर दिन, हर घंटे और हर मिनट असंख्य दुख देता रहा है और अभी भी दे रहा है, किस तरह न्यायोचित ठहराते हो ? ”
“ मैं पूछता हूँ कि उस ईश्वर ने यह दुनिया बनाई ही क्यों थी ? ऐसी दुनिया जो सचमुच का नर्क है, अनंत और गहन वेदना का घर है. उसने इस विश्व और उसमें मनुष्यों का सृजन क्यों किया ? आनंद लूटने के लिए ? तब उसमें और नीरो में क्या फर्क है ?”
“ मुझे यह मानना पड़ता है कि आपके पूर्वज बहुत चालाक व्यक्ति थे. उन्होंने ईश्वर व धर्म के बारे में ऐसे सिद्धांत गढ़े जिनमें तर्क और अविश्वास के सभी प्रयासों को विफल करने की काफी ताकत है.
ईश्वर व धर्म के बारे में ये सारे सिद्धांत विशेषाधिकार युक्त लोगों के आविष्कार हैं. ये अपनी हथियाई हुई शक्ति, पूँजी तथा उच्चता को इन सिद्धान्तों के आधार पर सही ठहराते रहे हैं.”
“ मैं पूछता हूँ कि तुम्हारा सर्वशक्तिशाली ईश्वर हर व्यक्ति को उस समय क्यों नहीं रोकता है जब वह कोई पाप या अपराध कर रहा होता है? ये तो वह बहुत आसानी से कर सकता है. उसने क्यों नहीं लड़ाकू राजाओं को या उनके अंदर लड़ने के उन्माद को समाप्त किया और इस प्रकार विश्वयुद्ध द्वारा मानवता पर पड़ने वाली विपत्तियों से उसे क्यों नहीं बचाया? "
“ क्या तुम मुझसे पूछते हो कि मैं इस विश्व की उत्पत्ति और मानव की उत्पत्ति की व्याख्या कैसे करता हूँ ? ठीक है, मैं तुम्हें बतलाता हूँ. चार्ल्स डारविन ने इस विषय पर कुछ प्रकाश डालने की कोशिश की है. उसको पढ़ो. सोहन स्वामी की ‘सहज ज्ञान’ पढ़ो. तुम्हें इस सवाल का कुछ सीमा तक उत्तर मिल जाएगा. यह (विश्व-सृष्टि) एक प्राकृतिक घटना है. विभिन्न पदार्थों के, निहारिका के आकार में, आकस्मिक मिश्रण से पृथ्वी बनी. कब ? इतिहास देखो. इसी प्रकार की घटना का जंतु पैदा हुए और एक लंबे दौर के बाद मानव. डारविन की ‘जीव की उत्पत्ति’ पढ़ो. और तदुपरांत सारा विकास मनुष्य द्वारा प्रकृति से लगातार संघर्ष और उस पर विजय पाने की चेष्टा से हुआ. यह इस घटना की संभवतः सबसे संक्षिप्त व्याख्या है.”
“ समाज को इस ईश्वरीय विश्वास के विरूद्ध उसी तरह लड़ना होगा जैसे कि मूर्ति-पूजा तथा धर्म-संबंधी क्षुद्र विचारों के विरूद्ध लड़ना पड़ा था. इसी प्रकार मनुष्य जब अपने पैरों पर खड़ा होने का प्रयास करने लगे और यथार्थवादी बन जाए तो उसे ईश्वरीय श्रद्धा को एक ओर फेंक देना चाहिए और उन सभी कष्टों, परेशानियों का पौरुष के साथ सामना करना चाहिए.”
“ ईश्वर में विश्वास और रोज़-बरोज़ की प्रार्थना को मैं मनुष्य का सबसे अधिक स्वार्थी और गिरा हुआ काम मानता हूँ.”
“ मैंने उन नास्तिकों के बारे में पढ़ा है, जिन्होंने सभी विपदाओं का बहादुरी से सामना किया, अतः मैं भी एक मर्द की तरह फाँसी के फंदे की अंतिम घड़ी तक सिर ऊँचा किए खड़ा रहना चाहता हूँ.”
“ मेरे एक दोस्त ने मुझे प्रार्थना करने को कहा. जब मैंने उसे अपने नास्तिक होने की बात बतलाई तो उसने कहा, - ‘देख लेना, अपने अंतिम दिनों में तुम ईश्वर को मानने लगोगे.’ मैंने कहा, - ‘नहीं प्रिय महोदय, ऐसा नहीं होगा. ऐसा करना मेरे लिए अपमानजनक तथा पराजय की बात होगी.”
शुक्रवार, 9 जून 2017
गोबर विज्ञान
तुलसी पीपल रात में भी आक्सीजन छोड़ते हैं| _ गोबर विज्ञान
Ajaib Jalalana
रात को अब कैसे सम्भव है पीपल का आक्सीजन छोड़ना,, जब सूर्य का प्रकाश ही नहीं होगा,, तो प्रकाश संश्लेषण क्रिया भी नहीं,, जब क्रिया नहीं तो आक्सीजन भी नहीं,,,
सजीव कोशिकाओं के द्वारा प्रकाशीय उर्जा को रासायनिक ऊर्जा में परिवर्तित करने की क्रिया को प्रकाश संश्लेषण (फोटोसिन्थेसिस) कहते है। प्रकाश संश्लेषण वह क्रिया है जिसमें पौधे अपने हरे रंग वाले अंगो जैसे पत्ती, द्वारा सूर्य के प्रकाश की उपस्थिति में वायु से कार्बनडाइऑक्साइड तथा भूमि से जल लेकर जटिल कार्बनिक खाद्य पदार्थों जैसे कार्बोहाइड्रेट्स का निर्माण करते हैं तथा आक्सीजन गैस (O2) बाहर निकालते हैं। प्रकाश संश्लेषण की प्रक्रिया में सूर्य के प्रकाश की उपस्थिति में पौधों की हरी पत्तियों की कोंशिकाओं के अन्दर कार्बन डाइआक्साइड और पानी के संयोग से पहले साधारण कार्बोहाइड्रेट और बाद में जटिल काबोहाइड्रेट का निर्माण होता है। इस प्रक्रिया में आक्सीजन एवं ऊर्जा से भरपूर कार्बोहाइड्रेट (सूक्रोज, ग्लूकोज, स्टार्च (मंड) आदि) का निर्माण होता है तथा आक्सीजन गैस बाहर निकलती है। जल, कार्बनडाइऑक्साइड, सूर्य का प्रकाश तथा क्लोरोफिल (हरितलवक) को प्रकाश संश्लेषण का अवयव कहते हैं। इसमें से जल तथा कार्बनडाइऑक्साइड को प्रकाश संश्लेषण का कच्चा माल कहा जाता है। प्रकाश संश्लेषण की प्रक्रिया सबसे महत्वपूर्ण जैवरासायनिक अभिक्रियाओं में से एक है।[1] सीधे या परोक्ष रूप से दुनिया के सभी सजीव इस पर आश्रित हैं। प्रकाश संश्वेषण करने वाले सजीवों को स्वपोषी कहते हैं।[2]
तर्कशील ग्रुप...
गुरुवार, 8 जून 2017
आर एस एस
Radheshyam Mahaseth _
बतौर गृह मंत्री सरदार पटेल ने 1948 में आरएसएस ( RSS) को प्रतिबंधित कर दिया | गोलवलकर सहित तमाम संघियों को जेल में ठूस दिया | आगे काफी समय तक प्रतिबंध लगा रहा | बाद में गोलवलकर के गिरगिराने और काफी अनुनय -विनय के पश्चात पटेल ने प्रतिबंध तो हटाया लेकिन इस शर्त के साथ कि संघ भविष्य में किसी राजनैतिक गतिविधियों में शामिल नही होगा सिर्फ सांस्कृतिक -सामाजिक कार्य ही करेगा | दरअसल संघ के उन्मादी -मनुवादी जिहादी मानसिकता का भान सरदार साहब को बखूबी हो चला था ,इसलिए उन्हें शक था कि अगर यह भड़काऊ -उन्मादी संगठन कभी राजनीति में आ गया तो देश में दंगा -हिंसा -हत्या की बाढ़ होगी और फिर मुल्क की अखंडता को सुरक्षित रखना नामुमकिन हो जाएगा | आज इस बात को लेकर बहस चल रही है कि क्या आरएसएस इस देश में कुछ वैसी ही मानसिकता को सींचने का काम कर रहा जैसा कि दुनिया के तमाम आतंकवादी संगठन करते है | इस बात पर बहस की गुंजाइश है और लोग अपने हवाले से तथ्यों और तर्कों के साथ आ भी रहे है | कोई पक्ष में तो कोई विपक्ष में | पिछले लगभग साल भर से मैं खुद निजी तौर से संघ की गतिविधियों को समझने की कोशिश में लगा हूँ | इस दौरान हमने गोलवलकर लिखित पुस्तकों सहित संघ से जुड़े कई किताबों और पत्रिकाओं का अध्ययन किया , संघ के विभिन्न शाखाओं -कार्यालयों में जा कर जुड़े लोगो -पदाधिकारियों से मिला और तमाम मुद्दों पर उनकी राय जानी | सभी चीजों को जानने समझने के बाद मैं जिस निष्कर्ष पर पहुंचा उसका लब्बोलुआब यही कि कट्टरता ,मनुवादी व्यवस्था और मुस्लिम विरोध ,यह तीन वह केंद्र बिंदु है जिसके इर्दगिर्द संघ की सारी गतिविधियाँ संचालित होती है | छोटे -छोटे बच्चे को दिमाग में मुसलमानों के खिलाफ जहर बोया जाता है , मनु की रचनाओं और विचारों को धर्म की चासनी में लपेट उस पुरातन मनुवादी युग को इस रूप में दिखाया जाता है मानों वह कोई सभ्यता का स्वर्णकाल रहा हो और हर बात में मुसलमानों के आगमन से पूर्व के भारत को ऐसे पेश किया जाता कि तमाम जातियों और वर्णों के होते हुए भी आपस में कोई वैर -भाव नही था ,हिन्दुस्तान में सब संपन्न और खुशहाल थे , आज जो भी समस्या है सबकी मूल वजह मुस्लिम शासन ही है | इस तरह के बिष उन बच्चों में भरा जाता और दिन -रात सुबह -शाम कट्टरता की जो घुट्टी पिलाई जाती वह किसी आतंकवादी को मिलने वाले कट्टर जिहादी प्रशिक्षण जैसा ही होता है | हालांकि संघ से जुड़े कई लोग ऐसे भी मिले जिन्होंने व्यक्तिगत रूप से माना कि संघ को अब अपने उस पुराने मोड से बाहर आना होगा क्योकिं आज के इस हिन्दुस्तान में उन पुरानी बातों की प्रसंगिकता नही रह गई | यानी संघ के भीतर भी कुछ प्रगतिशील लोग है लेकिन उनकी चलती नही जब तक कि वह मोदी जैसी किसी मजबूत स्थिति में न पहुँच जाए |
मातृ/पितृ सत्ता
मनुष्य के शिकारी बनने से पहले स्त्री और पुरुष के आधिकर बराबर थे क्यों की उस समय तक मुख्य जरूरत भोजन थी जो की कंदमूल ,फल आदि एकत्रित करने से पूरी हो जाती थी । संचय करने की प्रवृति नहीं थी अतः वर्चस्व को लेके संघर्ष नगण्य था ।
भालों के प्रयोग आ जाने के बाद पुरुष द्वारा शिकार करना आसान हो गया। चुकी शिकार के पीछे भागना ,पकड़ना आदि कार्यो में शारीरिक ऊर्जा अधिक लगती थी जो की पुरुष के शारीरिक बनावट के अनुरूप थी । स्त्रियों के साथ दूसरी समस्या उनका गर्भवती होना भी थी,गर्भवती अवस्था में स्त्री शिकार नहीं कर सकती थी अतः वह महीनो शिकार करना छोड़ देती ।
शिकार में कम सक्रियता के कारण शिकार करना मुख्य रूप से पुरुषो का पेशा हो गया , शिकार के बाद पशुपालन और चरवाही का उदय हुआ जो की पशुओं से ही जुड़े थे जिससे पूर्ण रूप से आर्थिक सत्ता पुरुषो के हाथ में आ गई और इस प्रकार पितृसत्तामक पक्ष उभर के सामने आया।
जब स्त्रियों ने कृषि की खोज की तो स्थति पलटी और आर्थिक सत्ता स्त्रियों के पक्ष में आ गई । तब मातृसत्ता के उदय से पितृसत्तामक या तो खत्म हो गया या निष्क्रिय प्रभाव में आ गया। आज भी जंहा कृषि प्रमुख राज्य है जैसे बंगाल / असम उनमे मातृसत्तामक पक्ष की मजबूती आसानी से देखी जा सकती है ।
किन्तु हल की खोज ने फिर से सत्ता पलट दी और कृषि पुरुषो के हाथ आ गई । हल और अन्य कृषि औजारों की खोज ने कृषि को सरल और अधिक लाभकारी बना दिया जिससे पुरुषो का अधिक से अधिक कृषि में भाग लेना जारी रहा , अतः वह वक्त भी आ गया जब कृषि पर पूर्ण रूप से पुरुष का कब्ज़ा हो गया और मातृसत्तत्मक पक्ष को खत्म कर पितृसत्तामक पक्ष कायम हो गया।
आर्यो की मूल प्रवृति पशु चरवाही ही रही , ईरान में कृषि इतनी उन्नत नहीं थी अतः वँहा पशुचारवाही ही मूल आर्थिक संपन्नता का आधार बनी रही।
आप ऋग्वेद में देखेंगे कि इसमें मूल रूप से पशुधन की ही कामना की गई है , इंद्र से अनार्यो से उनके पशु( गाय आदि) छीनने की स्तुतियाँ हैं।
ब्राह्मणिक ग्रन्थो में कृषि को इतना घृणित कार्य माना गया कि इसे शूद्रों का कार्य घोषित कर दिया गया । ब्राह्मण के लिए हल की मुठिया पकड़ना भी पाप निर्धारित कर दिया गया ।
संभवतः स्त्री और शूद्र को इसी लिए एक श्रेणी में रखा गया ...
क्रमशः
- संजय
मंगलवार, 6 जून 2017
आस्था और बुद्धि में ऋणात्मक सहसंबंध
Sneha Singh _ये कुछ कुछ अर्कमडीज़ के सिद्धान्त की तरह है । जितनी आस्था दिमाग में घुसेगी उतनी बुद्धि दिमाग से निकल जाएगी ।
कथा सार
पंडित जी ने एक कथा सुनाई।।।।।
"कथा का सार था इंसान साथ कुछ नहीं ले जाता"
कथा खत्म होने के बाद एक शंखनाद और सारा माल समेट पंडित जी चलते बने।।।।
शनिवार, 3 जून 2017
ढकोसला
धार्मिक कर्मकांडों का ढकोसला है श्राद्ध कर्म
संतोष शर्मा
मृत्यु के बाद मृत्य आत्मा की मुक्ति के नाम पर पाखंडी पंडितों और पुरोहितों द्वारा विभिन्न प्रकार के कर्मकांडों के जरिये अपनी उल्लू सीधा कर रहे हैं।
इंसान की मृत्यु के बाद उसकी आत्मा की भी मौत हो जाती है। किन्तु पाखंडी पुरोहित और पंडित द्वारा मृत आत्मा को सदगति प्राप्त कर के नाम पर श्राद्ध जैसे कर्मकांडों को बनाया गया है। और इन कर्मकांडों के सहारे इन पाखंडों की दुकान आज भी चल रही है।
परन्तु मेरे जैसे युक्तिवादी इन कर्मकांडों को अन्धविश्वास बताकर उसे मानने से इंकार करता तो , उस व्यक्त ये पंडित या पुरोहित विभिन्न प्रकार से यह समझने या डराने का प्रयास किया करते हैं कि यदि मृत व्यक्ति का धार्मिक रीति-रिवाज के साथ दाह-संस्कार नहीं किया गया तो उसकी आत्मा को मुक्ति नहीं मिलेगी। आत्मा भटकती रहेगी।
किन्तु सच तो यह है कि किसी इंसान की मृत्यु के साथ ही उसकी आत्मा की भी मृत्यु हो जाती है। और मृत्य आत्मा के भटकने की बात एक कल्पना मात्र है।
वास्तव में धर्म और अंधविश्वास के नाम पर ठगी का धंधा चलने वाले इन पंडितों और पुरोहितों को यह पता है कि अगर लोग आत्मा , ईश्वर में विश्वास करना छोड़ दे तो उनकी दुकानदारी बंद हो जाएगी। दूसरों की खून-पसीने की कमाई पर हाथ मरने के मौका नहीं मिलेगा।
आज मुझ जैसे युक्तिवादीओं की वजह से मुफ्त की कमाई खाने वाले पंडितों और पुरोहितों की रातों की नींद उड़ने लगी हैं।