कान फूँका गुरू -
पुराने जमाने से परम्परा चली आ रही है किसी एक गुरु से कर्ण मंत्र लेकर गुरु बनाने का । वह गुरू स्कूल कालेज का शिक्षक नहीं होता, कोई अनपढ़ या प्रायमरी पास भी हो सकता है । ये गुरू नये चेले के कान में धीमी आवाज में एक दो पंक्ति का मंत्र सुनाते हैं ताकि कोई दूसरा सुन न ले । शंख घंट की तेज ध्वनि में जरूरी नहीं वह मंत्र चेला को सुनाई दे। कर्ण मंत्र लेकर शिष्य अपने गुरू को चरण स्पर्श कर प्रणाम करता है, उपहार और दक्षिणा देता है । लोग हर साल कम से कम एक बार अपने कान फूँका गुरू को चढ़ावा देते हैं ।
ये गुरू लोग (आजकल के स्कूल शिक्षक भी अपने चेलों भक्तों/ विद्यार्थियों को यह खूब सुनाते हैं) -
गुरू गोबिंद दोऊ खड़े हैं, काके लागूं पाँय|
याने अपनी महत्ता का बखान खुद करते हैं|
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मैं किसी गुरू से कभी कोई कर्ण मंत्र नहीं लिया | कभी लूंगा भी नहीं|
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मेरे स्कूल के सभी शिक्षकों में से एक शिक्षकमुझे बहुत याद आते हैं। श्री सोनसाय चौहान | उन्होंने मुझे कक्षा पाँचवीं से उपन्यास कहानी पढने के लिए प्रेरित किया| वे मुझे पढने के लिए उपन्यास, कहानी देते थे| उनकी प्रेरणा से मैं जीवन में हर तरह के हजारों उपन्यास कहानी पत्रिकाएं कविता संग्रह पढ़ा| वे मेरे जैसे बहुत सारे विद्यार्थियों को रास्ता दिखाए होंगे|
गाँव के लोग उन्हें "गंड़ा मास्टर" कहते थे| मैं उनके घर पुस्तक लेने जाता था | कभी कभी पानी मांगकर पी लेता था| हमारे बड़े गुरुजी की पत्नी मुझे डाँटती थी - केंता रे, तुईं परे गंड़ा मास्टर घरें पानी पीइसू? ने जीबू तार घर के | (क्यों रे, तुम गांड़ा मास्टर के यहां पानी पीते हो मत जाना उसके घर |)
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अर्थ शास्त्र के अनुसार पारिश्रमिक (वेतन) लेकर अध्यापन करने वाले शिक्षक श्रमिक हैं|
कुछ शिक्षक अपनी निर्धारित ड्यूटी के अलावा भी अपने विद्यार्थियों के लिए कुछ करते हैं, मार्गदर्शन करते हैं । यह उनकी गुरुता है | वे ही गुरू होते हैं|
ऐसे ही मेरे गुरू श्री सोनसाय चौहान को नमन|
| हमारे महान गांड़ा मास्टर को नमन|
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