शुक्रवार, 9 दिसंबर 2016

धर्म और संविधान

        अपने अपने संविधान और अपने धर्म की आलोचना कर आवश्यक सुधार करना चाहिए| दूसरे की  आलोचना आवश्यक नहीं|
        देश काल परिस्थिति अनुसार संशोधन परिवर्तन होना चाहिए| यदि धर्मों में भी संशोधन होते रहें तो अंत में वह होगा हमारे देश का संविधान|

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें