यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत|
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहं युगे युगे|
(गीता प्रेस द्वारा प्रकाशित)
गीता के श्लोक को लिखने में हम भूल कर सकते हैं|
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अभ्युत्थानम्=वृध्दि,उत्कर्ष
अधर्मस्य=पाप,धर्म के विपरीत कार्य
तद=तब
आत्मानं=स्वयं का
सृजाम्यहम=सृजन करता हूँ ।
अतः होना चाहिए - "अभ्युत्थानम् धर्मस्य तदातत्मनं सृजाम्यहम् |
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