यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत|
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहं युगे युगे|
या
यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत|
अभ्युत्थानम् धर्मस्य तदात्मनं सृजाम्यहम् युगे युगे||
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गीता के श्लोक को लिखने में हम भूल कर रहे हैं? मुझे संदेह हुआ| मैं 1995 में गीता प्रेस गोरखपुर को पत्र लिखा| जबाब आया -" संदेह न करें| आगे वही रटा रटाया सुना हुआ अर्थ बताया गया जो गीता में लिखा हुआ है| यह अर्थ तो मैं कक्षा 9 वीं से पढ़ा हूं जब मैं मेरे दादा जी के कहने से रोज शाम को राम चरित और गीता के कुछ पन्ने उसमें दिए अर्थ सहित पढ़कर सुनाता था| मेरे दादा जी और ताऊ जी बैठकर सुनते थे|
कई लोगों को मेरे संदेह को व्यक्त किया| समाधान नहीं हुआ|
अभ्युत्थानम्=वृध्दि,उत्कर्ष के लिए
अधर्मस्य=पाप,धर्म के विपरीत कार्य का
तद=तब
आत्मानं=स्वयं का
सृजाम्यहम = सृजामि अहम्=सृजन करता हूँ ।
मेरे विचार से हमें लिखना चाहिए - "अभ्युत्थानम् धर्मस्य तदातत्मनं सृजाम्यहम् |
गीता का यह चित्र श्लोक सहित बड़ा बोर्ड जिनके घर के दिवाल पर लगे देखा उन्हें यह कहा लेकिन किसी ने नहीं मानी मेरी बात|
सोचने की बात है कि गीता में
"अधर्म के अभ्युत्थान के लिए" नहीं ,
"धर्म के उत्थान के लिए"
ही कहा गया होगा|
अभ्युत्थानम् अधर्मस्य (अभ्युत्थामधर्मस्य) नहीं|
अभ्युत्थानम् घर्मस्य (अभ्युत्थानम् धर्मस्य) कहा गया होगा|.
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सत्य को जानने की कोशिश करनी चाहिए. सत्य जानने के लिए उलट पुलट हर तरह के विचार पढ़ कर सोचना चाहिए. किसी लोखी गई या कही गई बात को आँख बंद कर नहीं मानना चाहिए. सत्य ही सुन्दर है. सत्य ही कल्याणकरी है.
शनिवार, 15 सितंबर 2018
यदा यदा हि...
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