कर्मेण्येव अधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन ।।
कर्म पर अधिकार होता है याने कि कर्म करें या नहीं, कौन सा क्या कर्म करें? यह हमारी मर्जी है । लेकिन कर्म के परिणाम पर कर्ता का अधिकार अधिकार नहीं होता। यह पूर्णतः सत्य है ।
इस श्लोक का आशय स्पष्ट है कि परिणाम पर आसक्त न हों। आसक्ति होने से साध्य को प्राप्त करने के लिए गलत साधन का उपयोग हो सकता है । यही आसक्ति भ्रष्टाचार का कारक है ।
विनोबा भावे जी ने भगवद्गीता पर अपनी पुस्तक में इसी गलत साधन के लिए सचेत किया है।
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