अगर कोई केवल दूसरे धर्म की बुराई करे. अपने धर्म की आलोचना कभी न करे तो निश्चित ही उसका उद्देश्य नफ़रत फ़ैलाना है ।
वास्तव में सभी धर्मों में कुछ अच्छाई कुछ बुराई है । अपने अपने धर्म की जानकारी ज्यादा रहती है, दूसरे धर्म की कम ।बेहतर है हम अपने अपने धर्म की बुराई कमी को बताएं । ताकि उसमें संशोधन परिवर्तन हो ।
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