शुक्रवार, 7 दिसंबर 2018

आघात

-आघात-
छः दिसम्बर ब्यानबे
दिन था रविवार
हम गर्वित थे हर्षित थे
मुस्लिमों को चिढ़ाकर
पुण्य के भागी बने थे
बाबरी मस्जिद गिराकर|
     अगला दिन सोमवार
     चैन की नींद सोया था
     अचानक मैंने देखा
      सामने साक्षात भगवान
      श्री राम चंद्र विराजे हैं|
मैं आनंद से विभोर
भगवान के चरण स्पर्श
करने हुआ उद्यत
किंतु भगवान राम ने
मारी एक लात
मेरे सीने पर|
    कहा - हे मेरे अंध भक्त
    तुने क्यों दिल दुखाया
    मानवता के भक्तों का
    मैं खुशी से रहता था
    अयोध्या के मस्जिद में|
तुझे क्या तकलीफ थी
कि उसे ध्वस्त कर दिया
जब तू रह सकता है
फैजाबाद के मुसाफिर खाना में
तो मैं क्यों नहीं रह सकता
अयोध्या के बाबरी मस्जिद में?
      अचानक नींद खुली थी
      देखा वह तो सपना था
      सचमुच एक सपना था
      उनका कोई चिन्ह नहीं था
      किंतु पदाघात का दर्द
      अब भी सीने में था|

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